काँटे

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काँटे

बीज बन पड़ते हैं

पहली साँस के साथ।

काँटे

उगते हैं

दूध की पहली धार के साथ।

काँटे

बढ़ते हैं

किलकिल भरी घुटनिया चाल के साथ।

काँटे

चुभते हैं

पीठ भर सीख की दुखन के साथ।

काँटे

घुसते हैं

अस्थियों के पूरे दो सौ छ: घटने तक।

काँटे

फिर पड़ते हैं

एक से दो होने पर।

काँटे

फिर उगते हैं

सृजन की पहली साँस के साथ।

काँटे

बढ़ जाते हैं अचानक

राह के आधे बच जाने पर।

काँटे

लहूलुहान करते रहते हैं

आधी राह पूरी होने तक।

काँटे

बोलते हैं

मृत्यु पश्चात सम्वेदना सन्देशों में।

काँटे

जड़ते हैं

हर व्यक्ति के सीने अच्छाई का प्रमाणपत्र।

काँटे

मरते हैं

ईश्वर के साथ प्रलय पश्चात।

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(चित्राभार: http://primej.blogspot.in/2009/11/thorns.html)