थोड़ा ठहरने दे

चलेंगे फिर साथी!
थोड़ा ठहरने दे,
मुड़ कर पीछे देख तो लूँ।

बाढ़ वर्षों से रुकी थी
तुम मिले
और बाँध दरका
फिर टूट गया,
बह गया बहुत कुछ।

कीच भरी जमीन पर खड़े हो
टूटन को देखना चाहता हूँ
वह जो बहे जा रहा है
क्या है उसकी पहचान?
क्या परिणति?
क्यों?
कैसे?
कहाँ?
क्या है सार्थकता उसकी?
क्या खोया क्या पाया?
क्या शेष है/रहा? 

थोड़ा ठहरने दे,  

मुड़ कर पीछे देख तो लूँ। 

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साथी हाथ थाम

साथी हाथ थाम। 

भोर के द्वार पर प्राची में दीप है
पसर गया लहलह माँग का सिन्दूर है। 
बटुर गया समय,
देह के वितान पर सफेदी भरपूर है।
कल मेंहदी रचाई थी! 
साथी हाथ थाम।

धूप भीगी और सूख गई, ढलना है।
हो चुका विस्तार बहुत, सिकुड़ना है।  
क्या हुआ जो मुक्ति की राह में, 
नाच रहे प्रेत हैं, चलना है। 
साथ होना काफी नहीं 
साथी हाथ थाम।

ये जो दरक रही है, छत नहीं, हम ही हैं ।
ये जो मौन है, सम्वाद नहीं, हम ही हैं। 
ये जो रोटी है, स्वाद नहीं, हम ही हैं। 
मेरे भी काँप रहे हैं, तुम्हारे भी काँप रहे हैं।
साथी हाथ थाम।  

पूर्णिमा है, ठंड है, एकांत है। 
मन के ज्वार फिर भी शांत हैं 
बहुत दिन हो गए दाह से सीझे हुए ।
कपोल पर कपोल तो ठीक है
पर साथ स्वेदहीन है 
साथी हाथ थाम। 

एक बार जाल और … मिलने जुलने का सलीका

अपनी बहुत सुना लिए, आज दो दूसरों की (मुझे बहुत बहुत पसन्द हैं):

बुद्धिनाथ मिश्र 
श्री ललित कुमार के सौजन्य से यह गीत पूरा मिल गया:


गीत 

एक बार और जाल फेंक रे मछेरे!

जाने किस मछली में बंधन की चाह हो। 


सपनों की ओस गूँथती कुश की नोक है,

हर दर्पण में उभरा एक दिवा लोक है,

रेत के घरौंदों में सीप के बसेरे,
इस अँधेर में कैसे नेह का निबाह हो?
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे!

उनका मन आज हो गया पुरइन पात है,

भिगो नहीं पाती यह पूरी बरसात है, 

चंदा के इर्द-गिर्द मेघों के घेरे, 
ऐसे में क्यूँ न कोई मौसमी गुनाह हो?
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे!

गूँजती गुफाओं में पिछली सौगंध है,

हर चारे में कोई चुंबकीय गंध है,

कैसे दे हंस झील के अनंत फेरे? 
पग-पग पर लहरें जब माँग रहीं छाँह हो!
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे!

कुमकुम सी निखरी कुछ भोरहरी लाज है,

बंसी की डोर बहुत काँप रही आज है,

यूँ ही ना तोड़ अभी बीन रे सँपेरे,
जाने किस नागिन में प्रीत का उछाह हो!
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे!
___________________________________ 

अज्ञात(आप को कवि का नाम ज्ञात हो तो बताइए)
देवता है कोई हममें न फरिश्ता कोई,
छू के मत देखना हर रंग उतर जाता है। 
मिलने जुलने का सलीका है जरूरी वर्ना
चन्द मुलाकातों में आदमी मर जाता है। 

पसीना

(1) 
पसीना 
टेबल पर टपकता है। 
खेत में टपकता है। 
फर्श पर टपकता है। 
दिन भर काम करते थक जाता है –
बिस्तर में रिसता है।

(2) 
पसीना 
निकलता निर्गन्ध है ।
हवा, इत्र, फुलेल, साबुन
बिगाड़ देते हैं आदत। 
कुछ भी कर लो 
गन्धाता रहता है। 


(3) 
जब डूब जाता है पैसा मार्केट में। 
जब परीक्षा के सवाल
किताबी याददाश्त गुम कर देते हैं।
जब फुलाई सरसो 
रातो रात लाही से मार जाती है। …
बिना परवाह किए कि 
बाहर जाड़ा है, गर्मी है कि बरसात 
पसीना निकलता है, 
हवा से जुगलबन्दी करता है 
और धीरे से दे जाता है
फिर से उठने लायक साँस।


(4) 
बाहर की दिन भर की चखचख
रोज गन्दे होते घर की सफाई
धीरे धीरे घिसते रहते हैं रिश्ते को।
इससे पहले कि रिश्ता दरके  
पसीना रातों को प्रीत के लेप लगाता है 
और सुबह तैयार हो जाती है – 
एक दिन भर चखचख 
एक दिन भर गन्दगी 
झेलने को। 

  

दुनिया उसी से कायम है

“तुम्हें पढ़ना चाहता हूँ”
“मैं अन्धी हो चुकी हूँ”
“तुम्हें लिखना चाहता हूँ”
“मेरे हाथ अब काँपते हैं”
“तुम्हें छूना चाहता हूँ”
“मेरे अंग गलित हैं”
“इस बार मेरे की जगह तुम्हारे कहना था”
“एक ही बात है। 
 पढ़ना, लिखना, छूना सब बेमानी हैं
अपने भीतर झाँक लो, सब हो जाएगा”
“तुम नहीं सुधरोगी”
“तुम भी तो नहीं सुधर पाए” 
“हाँ, कुछ है जो कभी नहीं बदलता “
“दुनिया उसी से कायम है”    

सब तुम में … होना, न होना…क्यों है?

कितने प्रारम्भ

कितने ही अंत 
ऊषा प्रतिदिन 
गोधूलि प्रतिदिन 
सब तुमसे 
सब तुम पर।
सब तुम में 
इतना कैसे सिमटा तुम में?
तुम हो ही क्यों?
अभी एक गीत सुना है:
तेरा ना होना जाने क्यों होना ही है। 
क्यों है? 
  
    

चित्रा का नेह, बिखरे पूजा पुष्प

village_sky 

गाँव का आसमान
वत्सल वत्सल
परदेसी लाल आया है! 
 chitra

‘चित्रा’ हरसाई
धा धा आई
श्वेत श्याम आँचल में
बाँध के रखा था
खुल गए बन्ध।
बरस रही नेह धार
धरती तर तरल तरल।

harsingar

हरसिंगार! तुमने बिखरा दिए
तज दिए साज शृंगार।
ये जो भूमि पर बिखरे हैं
जो रह गए अटके ही
मेरी पूजा के ही पुष्प हैं !
जिन्हें बीनते हैं लोग
देवी की आराधना हेतु।
जिन्हें यूँ ही बिखेर दिया –
पूरे परिवेश में
उन्हें
मैं किस हेतु सहेजूँ?
किसके लिए??