ज़ुनूँ का शौक

कौन कहता है आसमाँ में नहीं होते सुराख
ग़ौर से देखिए हमने भी कुछ बनाए हैं ।
नज़र भटकती नहीं किनारों की महफिल पर
ज़ुनूँ का शौक तो मझधार की बलाएं हैं। 
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स्पष्ट है कि पहली पंक्ति दुष्यंत से प्रेरित है। पहली दो पंक्तियों का संशोधन अमरेन्द्र जी ने किया है।  अंतिम दो पंक्तियों को आचार्य जी ने पास कर दिया 🙂 😉 
 जाने क्यों न तो इनके पहले कुछ रचा जा रहा और न बाद में। जैसा है प्रस्तुत है। 

आस्थावान

घर के बगल में
उग आया है –
विकास स्तम्भ ।
प्रगति के श्वान करने लगे हैं
उस पर ‘शंका’ निवृत्ति
 और
‘शंका’ समाधान।
घर के आँगन में
तुलसी लगा
अब ‘जल देने’ लगा हूँ।
.. मैं पुन: आस्थावान हो गया हूँ।

माता भूमि: पुत्रोऽहम्

आज अथर्ववेद के भूमि सूक्त (काण्ड १२, सूक्त १) से कुछ अंश। सम्पूर्ण बलाघात के साथ वेद पाठ सुनने का आनंद ही कुछ और है। सामने ग्रिफिथ का किया अंग्रेजी अनुवाद है लेकिन उससे हिन्दी अनुवाद करना अन्याय होगा। छान्दस मुझे आती नहीं, इसलिए मूल का आनन्द लें।

 मैं अर्थ नहीं कर सकता लेकिन अनुभव कर सकता हूं।

एक देहाती बोध कथा

घने डरावने जंगल से एक धुनिया (रुई धुनने वाला) जा रहा था। मारे डर के उसकी कँपकँपी छूट रही थी कि कहीं शेर न आ जाय !
धुनिए को एक सियार दिखा । पहले कभी नहीं देखा था इसलिए शेर समझ कर भागना चाहा लेकिन भागने से अब कोई लाभ नहीं था – खतरा एकदम सामने था। सियार को धुनिया दिखा जिसने अपना औजार कन्धे पर टाँग रखा था, हाथ में डंडा भी था। सियार की भी वही स्थिति, हालत पतली हो गई –
 राजा शिकार करने आ गया, अब मार देगा !
दोनों निकट आए तो उनके डर भी आमने सामने हुए। सियार ने जान बचाने के लिए चापलूसी की:
“कान्हें धनुष  हाथ में बाना, कहाँ चले दिल्ली सुल्ताना”
कन्धे पर धनुष और हाथ में बाण लिए हे दिल्ली के सुल्तान! कहाँ जा रहे हैं?
धुनिए ने उत्तर दिया:
“वन के राव बड़े हो ज्ञानी, बड़ों की बात बड़ों ने जानी” 
हे जंगल के राजा ! आप बड़े ज्ञानी हैं। बड़ों की बात बड़े ही समझते हैं । …

…प्रेम को

हुए नयन बन्द
टपके मधु बिन्दु
अधर पर अधर
और मधुर
हंसी
लाज घूंघट
झांक गई भाग
दसन अधर
मन सन सन
हाथ बरज हाथ
न करो स्पर्श
काम कुम्भ
हाथ झिटको नहीं !
बस रखो वहीं
सुख सुख
गलबहियां क्या खूब !
छू रहीं अनछुओं को
तार रहीं
अस्पृश्य को
प्रेम को।

शुभा मुद्गल और आबिदा परवीन को सुनते हुए

‘कामसूत्र’ फिल्म में शुभा मुद्गल  को सुनने के बाद आबिदा परवीन का गायन सुना। 
… ओ ss मीयाँ sssss … 
लगा जैसे आबिदा ‘ओम’ कह रही हों और शुभा का तानपुरे पर सधा गूँजता स्वर उसके आगे जोड़ रहा हो… ईयाँ ssss
ओ ss मीयाँ sssss … 
गूँज ही थी … सोचा एक प्रयोग करके देखते हैं और … फिर दो अलग अलग वादकों पर दोनों एक साथ .. उल्लासमयी मत्त आबिदा परवीन और तानपुरे सी गूँज लिए गम्भीर शुभा मुद्गल… शमाँ बँधी पागल के खातिर … 
कुछ थाह सी…  नहीं आभास सा लगने लगा .. उसका जिसने सनातन धर्म और इस्लाम दोनों को सूफियाने की राह दिखाई होगी… और फिर स्वर गंगा यमुना के बीच सरस्वती का नृत्य…. बहता चला गया..    
(दोनो चित्र इंटरनेट सम्बन्धित साइटों से साभार)

नाच रही तुम आओ
दुसह दिगम्बर रमे कलन्दर 
आज बनी यह धरा सितमगर 
फिर भी नाचूँ नामे तुम पर 
आओ, मैं नाच रही तुम आओ । 

साँस भरी जो लुढ़की पथ पर
तुम्हरी लौ ना बुझती जल कर 
लपलप हिलती दहके मन भर
अपनी हथेली लगाओ
नाच रही मैं, आओ। 

कोरे नैना अबोलन बैना
डूबी सिसकी अँसुवन अँगना
सजी सोहागन बाँधे कँगना
नेह नज़र भर आओ
नाच रही मैं, आओ।  

साँस भरी जोबन ज्यूँ अगनी
तरपत रूह कारिख भै सजनी
बरसो बदरा, भोगी हो अवनी
पूरन पूर समाओ 
नाच रही मैं, आओ।                                                                                 
                                                                                                                                                              
जगा हुआ स्वप्न सा देख रहा हूँ… शुभा और आबिदा एक अकिंचन की भाव सरिता पर स्वर नैया खे रही हैं ..ॐ … ओ ssss मीयाँ sssss ओम … ईयाँ sssss 

अपुरुष सूक्त

सहस्रशीर्षा ….
… ब्राह्मणो मुखमासीद्….
ऋषि !
होगा तुम्हारा पुरुष सृष्टि उत्पादक
हजारों सिरों वाला –
बॉस की रोज रोज की घुड़की से तंग आ
एक दिन
मेरे इकलौते सिर ने आत्महत्या कर ली।

उग आते हैं मेरे हाथ
लोकल बस और ट्रेन में चढ़ते हुए ।
उतरते हुए झड़ जाते हैं।
दोनों बगल झूलते हैं फाइलों के बस्ते
जिनसे लटकते लाल धागों पर
हजारो खुदकुशियों के निशान हैं।

पापी पेट के लिए
मेरे पैर खड़े रहते हैं हमेशा
बी पी एल राशन की दुकान पर।
फर्जी राशन कार्ड की कमजोरी
उनमें डगमगाती है –
द्रोण नहीं मैं
न मेरा लाल अश्वत्थामा
जो दूध की जगह
पानी में आटे को घोल
पिलाने पीने से
महाभारत के सेनापति महारथी
पुष्ट हों हमारे भीतर –
 मर चुके क्रोध पर मेरे विलाप से
शांति भंग की आशंका रहती है।

धुँधलाती सिर विहीन नज़र –
चश्मे का शीशा पावरलेस
बिटिया की बढ़ी फीस की पर्ची
दूर कर बाँचते
कल बहुत उदास हुआ ।
उसे कुछ महीने और
नहीं मिलेगा रिटायरमेंट।

ऋषि !
ब्याह कर आई मेरी ‘शांती’
बहुत सुन्दर थी।
तुम्हारे शांति पाठ को जपते
मैं अटक जाता हूँ
‘ओषधय: शांति:’ पर
कि
कमर दर्द, थायरॉयड, प्रदर
की लिस्ट में न जुड़े
उसे कुरूप बनाती एक और बिमारी।
‘ओषधय: शांति:’
शांती!
शांति: शांति: ।