सी!

छन छपी है धूप बगीची बीच सुबह सुबह
निफूले हरसिंगार तले तुम्हारी हँसी सी!
टँगी ओस अदद एक शमी की झुकी पत्ती पर 
सद्य:स्नात केश बूँद अकेली नयनाँ बसी सी!
उजली जमीं फेंक गया कोई लाल फूल कनैल तले
टोने टोटके वारी सब गोरे हाथ मेंहदी कसी सी

…वे आयेंगे

वे आयेंगे, जब गीत मुरझायेंगे
होठों को सिकोड़ देंगी झुर्रियाँ
और नैन सूख जायेंगे, वे आयेंगे
मुस्कुराते हुये गायेंगे मुकरियाँ
और हम न समझ पायेंगे!

दो पाट, स्त्री और कुँवारा

जब जाना कि प्रेम में हूँ 
प्रतीक्षा के दो पाट हुये 
एक नदी बह चली कल कल – स्त्री। 
झूठे पुरोहितों ने कहा 
ईश्वर ने मेरी पसली से गढ़ी – स्त्री। 
आश्चर्य नहीं कि वह अब तक कुँवारा है।

आश्चर्य!

आसन्न मृत्यु की स्थिति में
होती है अधिक आशावन स्त्री
जीवन की ओर, पुरुष की तुलना में
वह जननी, जीवनदायिनी,
प्रेम वात्सल्य।
जीवन ज्योतिष के पन्नों में
स्त्री प्रतीक भरनी नक्षत्र का देवता- यम
आश्चर्य!

काँटे

http://primej.blogspot.in/2009/11/thorns.html

काँटे

बीज बन पड़ते हैं

पहली साँस के साथ।

काँटे

उगते हैं

दूध की पहली धार के साथ।

काँटे

बढ़ते हैं

किलकिल भरी घुटनिया चाल के साथ।

काँटे

चुभते हैं

पीठ भर सीख की दुखन के साथ।

काँटे

घुसते हैं

अस्थियों के पूरे दो सौ छ: घटने तक।

काँटे

फिर पड़ते हैं

एक से दो होने पर।

काँटे

फिर उगते हैं

सृजन की पहली साँस के साथ।

काँटे

बढ़ जाते हैं अचानक

राह के आधे बच जाने पर।

काँटे

लहूलुहान करते रहते हैं

आधी राह पूरी होने तक।

काँटे

बोलते हैं

मृत्यु पश्चात सम्वेदना सन्देशों में।

काँटे

जड़ते हैं

हर व्यक्ति के सीने अच्छाई का प्रमाणपत्र।

काँटे

मरते हैं

ईश्वर के साथ प्रलय पश्चात।

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(चित्राभार: http://primej.blogspot.in/2009/11/thorns.html)

मुहब्बतों की तमाम बातों में…

फूल रखा है तुम्हारे सामने कहते हो कि पत्थर है
तो सिर से लगाना सँभाल रखना इसे शालिग्राम की तरह।
चमकते तो खूब हो पर लोगों को कसौटी चाहिये
घिस देना खुद या कह देना घिसने को बात बन जायेगी
खुशबू मिले तुम्हें न मिले इसकी शख्सियत तुमसे चमक जायेगी।
सूख जायेगा जब तो जानोगे कि था वाकई एक फूल
खुशबू उड़ जायेगी भेंट रह जायेगी,
मुहब्बतों की तमाम बातों में एक और बात जुड़ जायेगी।