मरघट में ज़िन्दा रहना है…

लिखता हूँ
रचता हूँ

कि
मैं मरूँ नहीं।


बार्बेक्यू की टेबल पर भुनते कबाब, 
मछलियाँ, प्रॉन
रेड वाइन से उन्हें
ग्रास नली से नीचे ढकेलते
उन गहराइयों में
जहाँ बस है तेज़ाब ही तेज़ाब
मृत्यु के उत्सव की उन घड़ियों में भी
मुझे याद रहती हैं –
चूल्हे पर रोटियाँ सेकती
ढिबरी की रोशनी में
बच्चे को ककहरा सिखाती
माताएँ।



मल्टी टास्किंग
और पैरलल प्रॉसेसिंग की बातों पर
अक्सर चमक उठते हैं कुछ खास दृश्य।
बेसन फेंटते, पकौड़ी छानते, परोसते हाथ
जेठ, ससुर के आते ही
एक सहज हरकत
सिर के पल्लू को दाँतों तले दबा
आँचल सँभालते
थाली सरकाते हाथ –
कोई पकौड़ी कभी जली नहीं!



पार्क में
सभ्य लड़कियाँ, औरतें नहीं आतीं
घरों की खिड़कियाँ तक
खोलने वालों को झिड़कियाँ देती हैं
बेंच पर क़ाबिज हैं
असामाजिक तत्त्व।
हवाओं में मुझे सूझती है
मृत्यु की आदिम गन्ध
और जिन्दा रहने को
साथ लेता हूँ एक ज़िन्दादिल।
वह टोकता है, डाँटता है उन्हें
और मेरे मुँह से झरने लगते हैं  
धमकियों और गालियों के
अनुष्टप मंत्र
मृतसंजीवनी ऋचाएँ ।
ज़िंन्दादिल हैरान होता है
– यह गालियाँ भी दे सकता है ! –
मैं देखता हूँ उसकी आँखों में
एक तिलस्म मर रहा है।
उसके लिए
मैं भी हो जाता हूँ  –
एक आम आदमी, अदना सा ?
और मुझे लगता है
ज़िन्दगी के लिए
तिलस्म मरने ज़रूरी हैं
निहायत ज़रूरी।



हाउस टैक्स भरने के लिए
एक ज़िम्मेदार नागरिक की तरह
अर्ज़ी लगाता हूँ
महीने भर बाद भी कुछ न होने पर
फेरी लगाता हूँ –
चपरासी बताता है
साहब यहाँ वे पेपर उड़ जाते हैं
जिन पर वेट माने वज़न नहीं होता।
ऑफिस में पेपरवेट के लिए बजट नहीं है
– समझिए!
और अचानक मैं पाता हूँ
मेरी ज़िन्दगी का एक हिस्सा
मर गया।
फिर वही अँधियारे हैं 
सिंगल फेज बिजली है
फोन पर कोई उत्तर नहीं
चिपचिप पसीने से नहाते
जमाता हूँ शब्द दर शब्द
और
मेरे भीतर वह जीने लगता है
जो मर गया था
उस ऑफिस बाबू की टेबल पर
हतप्रभ सा
बेरुखी को देखते देखते…



उन बैठकों में
भारत की प्रगति
अंकों, ग्राफ, तालिका, चार्ट आदि आदि पर
सवार हो
साँप सीढ़ियों की कलाबाजी दिखाती है।
और
भरी भीड़ में मैं रह जाता हूँ तनहा।
अंकों से दामन छुड़ा
ढेर सारे दशमलव
प्रोजेक्टर स्क्रीन से उतर आते हैं
इकठ्ठे हो मुझसे बतियाने लगते हैं।

उन्हें मैं बहुत बड़े शून्य
– सिफर –
की रचनाएँ समझाता हूँ।
ग़जब है कि हर बार
कभी एक तो कभी दूजा दशमलव
मुझसे कहता है –
“इसी बात पर एक कविता ड्यू हुई।”
देर रात की पार्टियों से लौट
कविता रचता हूँ
एसी की लयबद्ध आवाज
पर ताल देती हैं
ढेर सारी सिसकियाँ
नाचते हैं
द-श-म-ल-व
दशमलव
दशम-लव
दश-मल-व
शून्य के घेरे में।

सुबह को ऑफिस जाते
कार स्टीरियो बजा रहा है
बिथोवन की नवीं सिम्फनी।
रात के नाच का
आदिम संगीत
सिर पर अभी भी काबिज है।


स्टीरियो बन्द करता हूँ
मुस्कुराता तय करता हूँ
मरघट में ज़िन्दा रहना है… 

लैंगिक अनुपात – कुछ उमड़ते प्रश्न

आज इन आँकड़ों पर दृष्टि पड़ी । जन्म के समय, दुहरा रहा हूँ जन्म के समय प्रति हजार बालकों पर बालिकाओं की राज्यवार संख्या इस प्रकार है। इसमें सारे राज्य नहीं दिखाए गए हैं। महाराष्ट्र , आन्ध्रप्रदेश, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु को छोड़ दें तो लैंगिक अनुपात में सुधार दिख रहा है लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत आदर्श अनुपात 950 या उससे अधिक से भारत का वर्तमान लैंगिक अनुपात 904 अभी बहुत पीछे है।
राज्य सन् 2006-08 सन् 2001-03
पंजाब 836 776
हरयाणा 847 807
जम्मू कश्मीर 862 816
राजस्थान 870 855
दिल्ली 877 835
उत्तर प्रदेश 877 853
महाराष्ट्र 884 887
गुजरात 898 862
बिहार 914 861
आन्ध्र प्रदेश 917 932
मध्य प्रदेश 919 922
झारखण्ड 922 865
असम 933 904
तमिलनाडु 936 953
हिमाचल प्रदेश 938 803
पश्चिम बंगाल 941 937
केरल 964 892
छत्तीसगढ़ 975 964
स्थिति की जटिलता को और जटिल दर्शाता हुआ एक और आँकड़ा है जिसके अनुसार जन्म पूर्व गर्भ परीक्षण और उसके बाद गर्भसमापन की प्रक्रिया प्रति दिन 1600 बालिकाओं की जन्म पूर्व बलि ले रही है।
मन में कुछ प्रश्न उठ रहे हैं:
(1) कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रकृति लैंगिक अनुपात को बालकों के पक्ष में रखना चाहती है? नवजात बालिकाओं में बालकों की तुलना में प्रतिरोध क्षमता अधिक होती है इसलिए उनके जीवित बचने की सम्भावना भी अधिक होती है।
(2) भारत की कुल जनसंख्या के कितने भाग की जन्म पूर्व गर्भ परीक्षण की तकनीक तक पहुँच है? उसमें से कितने इसके प्रयोग को सही मानते हैं या इसका वास्तव में प्रयोग करते हैं?
(3) भारत की कितनी जनसंख्या आर्थिक रूप से इतनी सक्षम है कि इन महँगे परीक्षणों का व्यय उठा सके? कहना न होगा कि ग़ैर क़ानूनी होने के कारण ये परीक्षण महँगे हैं।
(4) मनुष्य की सोच और अवचेतन का सामूहिक प्रभाव बहुत व्यापक होता है। मैं यह कहना चाह रहा हूँ कि लोग नर संतान चाहते हैं , उसके प्रति पक्षपाती हैं । इस प्रबल सामूहिक विचार की नकारात्मकता का ही तो प्रभाव नहीं है कि बालिकाओं की संख्या अपेक्षतया कम है? इस नकारात्मक सोच का प्रभाव निषेचन और गर्भ में लिंग निर्धारण की प्रक्रिया पर भी तो नहीं पड़ता ? 
(5) सांस्कृतिक और पारम्परिक रूप से कुछ राज्यों में बालिकाओं के प्रति द्वेष कमतर रहा है, जैसे – पश्चिम बंगाल, केरल, छतीसगढ़, झारखण्ड आदि। इन राज्यों की सामाजिक गढ़न नारी के लिए बेहतर रही है। इनमें से केरल और छत्तीसगढ़ दो राज्य ऐसे हैं जहाँ अनुपात 950 से भी अधिक है।
वनवासी या ग्रामीण, जिन अर्थव्यवस्थाओं में नारी की सक्रिय और बराबरी की भागीदारी रही है, वहाँ अनुपात बालिकाओं के पक्ष में रहा है। स्वतंत्रता के बाद हुए तेजी से हुई अनियोजित प्रगति का बुरा प्रभाव भी लैंगिक अनुपात में परिलक्षित होता है। पुत्र की सनातन कामना पिछड़ी कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में थी तो लेकिन कृषि कार्य में नारी की सक्रिय भागीदारी ने उसकी स्थिति को ‘स्वीकार्य’ रखा। मशीनों के अभाव में हाथों का महत्त्व अधिक था – नर के हों या नारी के, अधिक अंतर नहीं पड़ता था। तकनीक तो थी ही नहीं कि भ्रूण परीक्षण हों और भ्रूण हत्या हो। अन्धविश्वास और संकीर्णता नारी के विरोधी तो थे लेकिन इतने प्रबल नहीं कि लैंगिक अनुपात पर घातक प्रभाव डाल सकें ।
अब स्थिति भयावह हो चली है। कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था होते हुए भी हरयाणा, पश्चिमी उत्तरप्रदेश और पंजाब जैसे भागों में हुए कृषि के मशीनीकरण और तकनीकी के प्रयोग ने समाज की सामंतवादी सोच को भी फलने फूलने के नए अवसर दिए हैं। पुरुष वर्चस्ववादी समाज आर्थिक रूप से चाहे कितना भी आगे बढ़ जाय, स्वस्थ और सुखी समाज की चन्द मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के मामले में पीछे ही रहेगा।  

अपनेपन की ठगाई !

सजी बारात
मेरी शादी
वह रात
बुरी रात लगी
सुनसान लगी
तुम जो न थी !

दोस्तों के बीच मुशायरा
कहकहे, वाह वाहियाँ
आहें
मैं खामोश
 बके जा रही
जुबाँ मशीनी
झुकती नज़रें न थीं
तुम्हारी आहें न थीं !

कंगन खुलने की बेला
शाम-ए-सुहाग रात
तुम आईं
मैं हुआ भैया
वह भौजाई
चौंक देखा उसने
ये कैसी आवाज़
आँखें डबडबाईं
होठ मुस्कुराते
रिश्ते बदले
बस लम्हे दो लम्हे !

लिख गया सब कहानी
उसके मन पर जुबानी
मेरा चेहरा जो उतरा
हुई रंगत बेपानी

कैसी थी वह रात !
एक शौहर ने सुनाई
अपनी इश्क की कहानी
लरज उठे थे आँसू
बह चले थे आँसू
दो दिल बस धड़के
रात भर थे धड़के
भोर ने दिखाया
वह तारा अकेला
जिसकी  साखी कभी
हमने लिक्खी थी
अनूठी
प्रेम कहानी ।

सुबह निखरी
ठन ठन ठिठोली
वह भाभी तुम ननदी
नज़र उठा
जो देखा
तुम दोनों ने हँसते –
मैंने जाना
क्या होती है
अपनेपन की ठगाई !

किस काम की ये गदराई ?

नीले बितान पर 
बदरी है छाई 
दई के मुँह पोत रही 
कालिख करुवाई । 
तरबतर पसीने 
जोत रही
खेतों में 
सूखी कमाई 
बूढ़ी है माई।  

पास के शहर में, टिन के शेड में 
परेशाँ लहना* है 
छा पाए कैसे, 
छ्प्पर जो महँगा है  
ग़जब उमस है भाई ! 
रोटी की भाप
हाथ आग है लगाई 
बड़ी  गरुई महँगाई। 

चूल्हे को झोंक झौंक, 
बालों को रोक टोक 
सिसके मैना है 
अम्मा की बात पर 
देवर की तान पर 
माखे नैना हैं 
न टूटे सगाई ! 
बाबा ने बियह दिया 
कसाई संग गाई ।  

छोड़ो बदरी शर्मी 
निकल नाचो बेशर्मी 
जो झड़ पड़े 
बरस पड़े
झमाझम चउवाई।
हुलसे खेतों में माई 
भागे लहना से महँगाई 
मिटे मैना की करुवाई 
घोहा घोहा मूँठ मूँठ 
झरे छर छर कमाई 

अब बरसो भी,
किस काम की ये गदराई ?

* लहना – वृद्धा के बेटे का नाम 

बेढंगा

ये डण्डे का फंडा है
आदमी रहता चंगा है।

डंडे से भौकी पिटवाओ
डंडे को तेल लगाओ
डंडा कभी न मन्दा है,
मालिक इसका अन्धा है।

डंडा खाते नेता लोग
उलटी करते नेता लोग
चाटे उसको जन्ता है
डंडा बड़का बंका है।

डंडे ने तेल पेरवाया
कोल्हू से जीवन घबराया
 साँड़ हुए सब बैला हैं
अँड़ुवा भर भर थैला है।

डण्डे ने पारक बनवाया
खेतों से सब मेंड़ उड़ाया
चलती उन पर लैला हैं
पाँव में उनके छैला हैं।

डंडा नाचे चौराहे पर
आँखें फूटीं चौराहे पर
लुटता जन जन अन्धा है
डण्डा माँगे चन्दा है।

कैसे ?

हवाओं में घुली 
ताज़ा रक्त गन्ध 
मलयानिल सुगन्धि भरे 
शब्द कैसे रचूँ ? 
चीखते अखबारों में 
सिन्दूर की सिसकियाँ हैं 
ढोर चराते कान्हा की बाँसुरी सा
कैसे बजूँ? 
घना घनघोर जंगल 
घेरे सहेजे है धरती के मंगल 
लहक उठी हैं आनन्द तुकबन्दियाँ 
पर ऊँची डालों से 
घात है लगी हुई 
अहेर की रपट पलट  
आँखों को मूँद 
गीतों के बन्ध कैसे गढ़ूँ ? 
निर्लज्ज है प्रकृति 
प्रात है, दुपहर है, साँझ है, रात है 
व्यवस्थित और उदात्त  
रंगशालाओं के पाठ हैं 
आँसुओं को रोक 
अज़गर धीर धर
फुफकारते अभिनय 
कैसे करूँ? 
सौन्दर्य है, राग है 
नेह है,
छन्दमयी देह है 
सनातन जननी !
तुम्हारी आराधना में 
प्रेम में 
भक्ति में 
पगूँ? 
डगमगाते हैं पग । 
सृजन लास्य जैसे 
नर्तन कैसे करूँ? 
कैसे ??