नमस्तस्यै

27052010(001)

चित्राभार : इंडियन एक्सप्रेस

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केवल कष्ट है।

बस वही है

वहीं है जीवन

जो

जहाँ

मित्रों के साथ बतिया लिए हँस लिए

किसी सुन्दर शरीर को जी भर सराह लिए

सड़क पर चलते किसी से छिप कर ‘रेस’ लगा लिए

किसी पत्थर को ले हाथ यूँ ही गड्ढे में उछाल दिए

आँख में चुभती धूल को बिसरा नभ निहार लिए

किसी बच्चे को दुलरा दिए –

बाकी सब अंट शंट है

भ्रष्ट है

सबको चीरता

केवल कष्ट है ।


चुपचाप रहता न मुस्कुराता हूँ मैं
पड़ोसी को देख 
उसी की तरह 
अजनबी हो जाता हूँ मैं।
न कहता कुछ भी 
दिल में सब रखता 
दोस्तों को गले लगाता हूँ मैं । 
अपने काम से काम 
एक शहरी का फर्ज़ 
निभाता हूँ मैं। 
डिनर के बाद 
दो ह्विस्की के पैग
लगाता हूँ मैं। 
फिर भी जाने क्यों 
सोते सोते रातों में 
यूँ ही जाग जाता हूँ मैं।  
जाने कैसा है ये फर्ज़ 
न जानूँ फिर भी
निभाता हूँ मैं
यूँ ही जाग जाता हूँ मैं।

कविता नहीं – प्रलय प्रतीति

बरसी थी चाँदनी
जिस दिन तुमने लिया था
मेरा – प्रथम चुम्बन।
बहुत बरसे मेह
टूट गए सारे मेड़
बह गईं फसलें
कोहराम मचा
घर घर गली गली
प्रलय की प्रतीति हुई।
बेफिकर हम मिले पुन:
भोर की चाँदनी में
मैंने छुआ था तुम्हें
पहली बार
(चुम्बन में तो तुमने छुआ था मुझे !)
पहली बार तुम लजायी थी
घटा घिर आई थी
उमड़ चली उमस
खुल गए द्वार द्वार
मचा शोर
चोर चोर
तुमने लुटाई थी
बरसों की थाती
मैंने नहीं चुराई थी।
 …
इतने वर्षों के बाद
आज भी  आसमान में घटाएँ हैं
लेकिन कहीं कोई कोहराम नहीं
कहीं कोई शोर नहीं
जब कि पार्क में
बैठा है युगल
मुँह में मुँह जोड़े।
न होता उस दिन
अपराध बोध
तो आज हम अगल बगल खड़े
कर रहे होते विमर्श
तुम्हारी कमर के दर्द पर
मेरे घुटनों की सूजन पर ।
कहीं तुम भी किसी जगह
सोचती होगी यही
अब कोई मेघदूत नहीं
जो सन्देश लिए दिए जाँय।
अब उमर भी कहाँ रही ?
घर की छत न टपके
मरम्मत के लिए
राजगीर आया है
भीतर से फरमान आया है:
नीचे आओ
नज़र सेंकनी बन्द करो
कल तूफान आएगा
टीवी ने बताया है।
मैंने सारी उमर
प्रलय गीत गाया है
कैसे थे सुर उस दिन !
जब  प्रलय प्रतीति हुई थी?

युगनद्ध – 4

तुम्हारी याद में गुलाब रोपे थे 
फूलों की जगह बस काँटे खिले 
हवा लाल नहीं 
जमीन सन गई है 
लाल लाल 
अपना रोपा उखाड़ने चला था।

हरियाली से ललाई टपक जाती है 
जी के फाँस ग़र हिलाता हूँ
.. तुम अब भी घाव हरे कर सकती हो। 


मैं कितना अद्भुत प्रेमी हूँ  
हरियाली में ढूढ़ता हूँ
अब भी वह लाली
जब सूरज लजाया था –
सुबह सुबह पहली बार 
हम जो युगनद्ध हुए थे ।

राग यमन को सुनते हुए

यह बंदिश राग यमन को सुनते हुए रची गई:

जागो जागो देश महादेव
बन्द आँख कैसा ये ध्यान
जपते जो उद्दाम काम
कामारि तुम भूले उदात्त भाव
खोलो त्रिनेत्र नंग भस्म, अनंग
जागो जागो देश महादेव।

जटाजूट सँभारो अधोमुख गंगा
पतित न हो पावनी ज्ञानगंगा
सँभारो हे देश तुम शंकर
शमन करो दुर्वह वेग
जागो जागो देश महादेव ।

शंकर भारत के प्रतीक पुरुष हैं। बचपन से ही उनकी परिकल्पना मुझे मुग्ध करती रही है। . .. 
सरस्वती के किनारे का पशुपति, वैदिक बलियूप विकसित लिंग, देवासुर रुद्र और गाँव गाँव हिमालय सुता गौरा पार्वती के साथ भटकता लोककथाओं का महादेव – खेतों में बैल की पीठ पर श्रमसीकर बहाता, जंगलों के साँप बिच्छू धारण करता सबका शमन करता भोगी विलासी महात्यागी महायोगी महादेव ।
काम को अपने उपर सवारी नहीं करने देने वाला शंकर, कामदेव को भस्म करने वाला शंकर लेकिन लोकहित शक्ति के साथ हजारो वर्षों तक संभोगरत रहने वाला महादेव क्या कुछ संकेत नहीं देता !
यौन उच्छृंखलता और मध्ययुगीन/विक्टोरियन नैतिकता के पाखंड के दो अतिवादी किनारों के बीच ज्ञान गंगा का प्रबल प्रवाह है। उसके वेग, उसकी उद्दामता को थाम नई दिशा देने को यह देश उठ क्यों नहीं पा रहा?
किसकी प्रतीक्षा है ? 

बेहयाई हूँ मैं।

हिन्दी ब्लॉगरी का वही हाल है जो हिन्दुस्तान का है।
मन खिन्न हुआ और चन्द द्विपदियाँ रच गईं, प्रस्तुत हैं। 

शाद कोई नहीं तमाशाई हूँ मैं 
तेरी पीर से चीखूँ, भाई हूँ मैं।

क़ाफिर इस तरफ गद्दार उस तरफ  
दीवार से उठती दुहाई हूँ मैं।


ढूढ़ें आलिम-ए-बहर अन्दाजे बयाँ 
एक सीधी सी सच्ची रुबाई हूँ मैं। 


बुतखाने न जाऊँ न कलमा पढ़ूँ 
मौलवी का पड़ोसी ढिठाई हूँ मैं। 


लुटी सारी ग़रीबी नंगों के हाथ 
बची बस्ती की गाढ़ी कमाई हूँ मैं। 



बड़े अहमकाना सूरमा-ए-महफिल 

मुझको आए हँसी बेहयाई हूँ मैं।