गोमती किनारे – ब्लॉग पर मेरी दूसरी कविता

गोमती किनारे
बादर कारे कारे
बरस रहे भीग रहे
तन और सड़क कन
घहर गगन घन
धो रहे धूल धन
महक रही माटी.

बही चउआई
सहेज रही गोरी
केश कारे बहक लहक कपड़े
कजरारे नयन धुन
गुन चुन छुन छहर
फहर बिखर शहर सरर
चहक उठे पनाले.

बिजली हुई गुल
पहुँची गगन बीच
हँसती कड़क नीच
ऊँची उड़ान छूटी जुबान
जवान जान खुद को
नाच उठी
भुनते अनाज सी.

….
….
सब कुछ हो गया
खतम हुआ
खोया रहा साँस रोके
सब कुछ सोच लिया
घर घुस्सी तू आलसी !

मुझसे पहली सी मुहब्ब्त. . अंतिम भाग

नज्म बहुत सरल सी दिखती है, प्रेमी प्रेमिका से कह रहा है कि तुम अभी भी सुन्दर हो लेकिन जमाने में इतने दु:ख दर्द हैं कि मैं अब तुम्हारी आँखों में बस डूब कर ही नहीं रह सकता, मुझे तो तमाम जुल्मों सितम भी दिखते हैं और तुमसे मिलन के बजाय जुल्मों सितम को कम करना मुझे अधिक आकर्षित करता है.

यह नज्म जब लिखी गई थी तो समाजवाद और कम्यूनिस्ट आन्दोलन का जोर था और उस ज़माने के हर सेंसिबल युवा की तरह फैज़ को भी इस विचारधारा ने बहुत प्रभावित किया.

लेकिन! लेकिन !!
फैज के अन्दर इस पुराने देश के संस्कार भी रक्त बन कर बह रहे थे और जुल्मो सितम को देखने, बूझने और भोगने से उत्पन्न दु:ख ने अलग ही रास्ता लिया. यहीं यह नज्म कइ स्तरों वाली हो जाती है. जन के दु:ख से दु:खी अभिव्यक्ति समाजवादी सोच जैसी दिखते हुए भी सूफी दर्शन, द्वैत और विशिष्टाद्वैत की सीढ़ियाँ चढ़ती बौद्ध दर्शन की करुणा में समाहित हो जाती है.

किसी ने कहा है कि श्रेष्ठ रचना रचयिता के कलम से निकलते ही उसकी न होकर सबकी हो जाती है. फिर उस पर रचयिता का कोई बस नहीं रह जाता और उसके विभिन्न अर्थ स्वयं रचयिता को भी स्तब्ध कर देते हैं…. ऐसा तो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था !

‘तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है?’
बहुत सी कविताओं और फिल्मी गीतों में बदले रूपों में आ आ कर यह अभिव्यक्ति आज कुछ पुरानी सी लगती है लेकिन कल्पना कीजिए जब यह लाइन पहली बार आई होगी. प्रेम की गहनता को व्यक्त करती इससे अच्छी लाइन हो ही नहीं सकती !

सूफी मार्ग में ईश्वर को प्रेमिका रूप में भी देखा जाता है.
सब कुछ भूल कर दीवानगी की उस हद तक पहुँच जाना कि बस मासूक की आँखों के सिवा कुछ न दिखे और दुनिया की सारी बहारें ठहर सी जाँए…जरा सोचिए फैज़ एक आम लड़के और लड़की के प्यार को भी किस तरह से ट्रीट करते हैं !! और उसके बाद का आघात जहाँ सारे जहाँ का दर्द अपना हो जाता है… जैसे कि वह मासूक जन जन में समा जाय. वह दर्द, वह यातना, वे षड़्यंत्र, वे दर दर बिकते जिस्म, शोषण, वह तिल तिल गलन…फैज़ सब भोगते हैं. .और उमड़ता है दु:ख , घनघोर सर्व समाहित करता दु:ख..

दु:ख शब्द में जो सान्द्रता है वह ‘ग़म’ में नहीं.
फैज़ जुल्मो सितम और उसकी पीड़ा की सान्द्रता को दर्शाने के लिए दु:ख शब्द का प्रयोग करते हैं और कविता बुद्धत्त्व की गरिमा से उद्भाषित हो जाती है.. सर्वं दुक्खम. ..
ज्ञान के बाद ही तो मुक्ति है.
अब मुझसे पहली सी मुहब्बत मत माँगो..

कोई ढूढ़ दे मेरे लिए

बात पुरानी है. देवरिया के जी.आइ.सी में मैं नवीं में था. वार्षिक समारोह या जिला स्तरीय खेल कूद प्रतियोगिता थी जिसके दौरान काव्य अंत्याक्षरी जैसी प्रतियोगिता भी हुई थी. उसी में मैंने सुनी थी ये पंक्तियाँ:

“एक बार फिर जाल फेंक रे मछेरे
जाने किस मछ्ली में बन्धन की चाह हो.”

आज तक वह पूरा गीत और उसके गीतकार का नाम ढूढ़ रहा हूँ. नहीं मिले.

सम्भवत: आप मेरी सहायता कर सकें ?

मुझसे पहली सी मुहब्ब्त . . . (भाग 1)

रात का समय. एक किशोर बी बी सी हिन्दी सेवा की रात्रि कालीन सभा सुन रहा है. मादक स्वर में एक नज़्म गूँजती है …मुझसे पहली सी मुहब्ब्त मेरी महबूब न माँग.
. . आठवीं (या नवीं) में पढ़ते किशोर को पहली बार यह अनुभव होता है कि प्यार क्या है ! या यूँ कहें कि क्या हो सकता है !!
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वह किशोर मैं था. फ़ैज रचित यह नज़्म नूरजहाँ गा रहीं थी. मन में फॉंस सी चुभ गई. बहुत बर्षों के बाद मुबारक बेग़म के गाए गीत कभी तनहाइयों में यूँ हमारी याद आएगी . .. को सुनते ही पुरानी फाँस हिल सी गई. मैंने फ़ैज की नज्म और नूरजहाँ के स्वर में उसका ऑडियो तलाशना प्रारम्भ किया. दोनों मिल गए . नज्म प्रस्तुत है. ऑडियो आप स्वयं तलाश लें.

मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब न माँग
मैंने समझा था के: तू है तो दरख्शाँ है हयात1
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर2 का झगडा क्या है?
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को है सबात3
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है?
तू जो मिल जाए तो तक़दीर निग़ूँ4  हो जाए
यूँ न: था मैं न फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
और भी दु:ख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत5 के सिवा
अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म6
रेशम-ओ-अतलस-ओ-कमख़्वाब7 में बुनवाए हुए
जा-ब-जा8 बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथडे हुए, ख़ून में नहलाए हुए
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों9 से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे?
अब भी दिलकश10 है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे?
और भी दु:ख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत5 के सिवा
मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब न माँग .
नक़्श-ए-फ़रियादी भाग-2, 1941, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
(साभार: राजकमल पेपरबैक)

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1. सुखमय जीवन, 2. सांसारिक दु:ख, 3. ठहराव, 4. बदल जाना, 5. मिलन का आनन्द्, 6. क्रूरता का अँधकारमय जाल, 7. कीमती वस्त्र 8. जगह जगह, 9. बीमारियोँ की भठ्ठी , 10. आकर्षक
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इस नज़्म की गहराई को दो बातों से मैंने समझा है:

“तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है?” और भरपूर उर्दू में भी “ग़म” के बजाय “दु:ख” शब्द का प्रयोग.
अपनी समझ बाद में बताउँगा. फ़िलहाल आप अति अद्भुत नज्म का आनन्द लें. ….. जारी.

प्रार्थना – ब्लॉग पर मेरी पहली कविता

धूप!
आओ,अंधकार मन गहन कूप
फैला शीतल तम ।मृत्यु प्रहर
भेद आओ। किरणों के पाखी प्रखर
कलरव प्रकाश गह्वर गह्वर
कर जाओ विश्वास सबल ।
तिमिर प्रबल माया कुहर
हो छिन्न भिन्न। सत्त्वर अनूप
आओ। अंधकार मन गहन कूप
भेद कर आओ धूप।