बरहा

चभकी लाही1 बरसी, सरसो खेत
फूला मान झर गया, हुये अचेत।

महँगी मरण किसानी, जीना सेत
कर्जे की माया में, साँसें लेत। 

रमें बुझती राख में, भटकें प्रेत
चाँदी सा चमके है, बहती रेत।

बहुरेंगे दिन फिर से, कहती प्रीत 
इक ईति2 दूजी भीति3, ऐसी रीत। 

रहमी हो हारे पल, जीवन भार
कूड़े कठिन बोझ में, सार सँभार। 
हा हा क्यों रोना क्यों, विधि का खेल
मुक्ति की आशा लिये, भार ढकेल।

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1 कोहरे और शीतलहर के समय आसमान से समूह में गिरने वाले बहुत छोटे छोटे कीड़े जिनसे सरसो की फसल बरबाद हो जाती है।
2 खेती पर आने वाली 6 विपत्तियों अनावृष्टि, अतिवृष्टि आदि का सामूहिक नाम
3 भय, डर
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इन पंक्तियों को बरवै छ्न्द विधान(12, 7, 12, 7 मात्राओं) पर बहुत ढीले तरीके से रचा गया है। यह छन्द अवधी का लोकप्रिय ‘देसज’ छन्द है और आधुनिक हिन्दी में सम्भवत: इसका प्रयोग नहीं हुआ है।
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ई मेल से मेरे एक बहुत ही प्रिय ब्लॉगर की टिप्पणी प्राप्त हुई है। महत्त्वपूर्ण है। इसलिये उत्तर के साथ प्रकाशित कर रहा हूँ: 
सबने देखे बसंत, फूले खेत
तुमने देखे आँसू, दर्द अनेत


…..बेहतरीन । प्रतिक्रिया बरवै छंद में ही देने का प्रयास किया हूं। सही है ? बरहा का शाब्दिक अर्थ ?


उत्तर: 
वाह! क्या बात है। और लिखिये न। फागुन पर कुछ हो जाय। 🙂 

बरहा कई अर्थों में प्रयुक्त हुआ है: 

– बारह पंक्तियों के कारण बरहा कह दिया। मात्रा इधर उधर 🙂 
– अवधी में ‘बरहा’ माने नाली होता है। वेदना को बहाने का काम लिया इन छ्न्दों से इसलिये। 
– जैसे झगड़ा से भोजपुरी में ‘झगरहा’ माने झगड़ा करने वाला होता है वैसे ही ‘बरवै’ से बरहा 🙂 
– माघ के अंतिम 6 दिन और फागुन के शुरुआती 6 दिन मिला कर एक कालखंड होता है जब गई ठंड फिर से आती है। कोहरा फिर से फैलता है और दिन अजीब सा ठंडा हो जाता है। पुराने जमाने में इस समय पशु बहुत मरते थे और सम्भवत: भोजन संकट के कारण कुछ अंत्यज जातियाँ उनके मांस का भक्षण करती थीं। इस कालखंड को ‘चमरबरहा’ कहा जाता था। लाही का समय इससे दो तीन सप्ताह पहले का होता है। 
किसानों की तिलहन फसल चौपट हो जाने की अवसादी मन:स्थिति चमरबरहा तक जारी रहती है और उसके बाद वे सब भूल भाल कर फिर से किसानी में लग जाते हैं। ये बरवै उसी काल पर हैं इसलिये घृणित खाद्य सूचक शब्द हटा कर बस ‘बरहा’ कह दिया। 
    
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चन्द पंक्तियाँ

प्रीत की रंगत मेंहदी के निखार में नहीं

उमंग देखो, जिसके कारण लगाई जाती है।

हैं लब चुप और वो भीतर घुमड़ते रहते हैं

नाकाफी सादे हर्फ हैं, बेवजह सजाई पाती है।

हरदम तुम्हें वजहें मिलें कोई जरूरी नहीं

ढूँढ़ते जिन्हें दरबदर, ग़ैरों के दर पाई जाती है।

रोज बाँचते हैं अफसाने मन के शफेखाने में

कहें कभी जो, हकीक-ए-मश्वरा निभाई जाती है।    

  

 

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प्रशांत प्रियदर्शी :
कवन देश का राजा अच्छा कवन देश की रानी
कवन देश का राजा अच्छा कवन देश की रानी
कवन देश का खाना अच्छा कवन देश का पानी
जोगिरा सा रा रा रा.. जोगिरा सा रा रा रा

उत्तर में मैं:अमरीका का राजा अच्छा, भारत की रानी 
अमरीका का राजा अच्छा, भारत की रानी
स्विस देश का खाना अच्छा, पीयो मिस्री पानी।
जोगिरा सा रा रा रा सा रा रा रा रा रा रा रा

जीय जीय रानी बहिना, घोटालों की नानी
घोटालों की नानी रानी, बनती बहुत सयानी
एक्के रंग मंत्री के साफा, देखलावें ईमानी।
जोगिरा सा रा रा रा सा रा रा रा रा रा रा रा

महँगू अब्बो महँगा दाखिल, तेल नहीं न घानी
तेल नहीं न घानी भैया, भड़भुजवा किसानी
गदबेरा में चिलम चढ़ावे, पीये ललका पानी।
जोगिरा सा रा रा रा सा रा रा रा रा रा रा रा

एक कविता का ड्राफ्ट

एक कविता का ड्राफ्ट:
जीवन दाल,स्मृतियाँ नमक।
आत्मा भक्षक।
दाल कम कमतर, नमक बढ़ बढ़कर।
एक दिन बस नमक ही नमक।
जीवन खत्म।
आत्मा फुर्र।
नमक की अधिकता – जीवन के लिये घातक। 
आत्मा अमर है। 

नमी, पत्थर और सोना

(1) 

आँखें नम होती थीं, तुम पत्थर के थे। 
चौंधियाती हैं अब, सोने के हो गये हो। 
(2) 
नमी को चाहिये था सहारा, तुम्हें पत्थर में तराशा।
सहारे ने दिया ठसक ठिकाना, तुम्हें सोने से मढ़ दिया।