अछ्न्द संग

शब्द चुप हैं कि उनकी जुबाँ काट ले गया कोई
मन में अन्धेरा है भावों की परछाइयाँ हैं गुम 
कुछ लगता ही नहीं कि वजूद हुआ दफन कहीं 
ऐसे में कैसे कह दें कि चहुँ ओर खलबली है? 


शांति है, स्तब्ध हैं सब गुमसुम अपने काम में 
बैठा लिया है संतुलन सफल स्याह ने शुभ्र से 
दिन कटने हैं, कटते हैं आराम से बिला वजह 
जिन्दगी बिला वजह, वक़्त बिला वजह बेवजह। 


शोर उठते हैं, उठते रहेंगे कि उठना है काम उनका 
क्या पड़ी है तुम्हें भागने की पीछे करो काम अपना ?
ये दुनिया है, ऐसी ही है, थी और रहेगी पसरी ऐसी
जो गुस्सा है, थूको पीकदान में, इसकी बखत इतनी।


चुप हूँ सोचता कि दिमाग जिन्दा खुराफात जिन्दा 
जिन्दा यूँ ज्यों जमीन में कसमसाता केंचुआ 
जब होंगी बारिशें और बिलों में भरेगा ताजा पानी 
निकल रेंगने कुचल जाने को करेगा मजबूर पानी।


पानी जब घुसता है ले हवाई बुलबुले बिलों में
हवस दहके उमसते हैं बीज फूटें अंकुर दिलों में 
मैं चुप काम करूँ अपना जमीन को छ्लनी बना 
मैं दफन नहीं रेंगता सुनता हूँ आहटें खलबली की। 

छ्न्दसा

इस रात रक्त उतर आया है आँखों में 
लाल डोरों को गारने निकले दूर सात घोड़े 
क्यों न तब तक सेज की सवारी कर लें?

मालूम है कि तुम्हें दूर जाना है
मालूम है कि यह चहन बेगाना है 
क्या कहूँ जो इतने दिन बाद आई हो ? 
लबों पर लजाये हर्फ सी फड़फड़ाई हो 
अब चाँदनी नहीं खिलखिलाहटों के साये हैं। 

न भूला चाहते चुम्बन चह चह
न भूला हाथों को हटा रखाते रह रह 
न भूला कपोलों को सटाते सह सह 
न भूला ताप को दबाते नह नह
पाप और पुण्य साथ नग्न नहाये हैं।  

क्यों पाखण्ड देह को क्षुद्र कह कर?
लिपटना क्यों वर्जना की साँस भर कर?
नहीं उफान अब वह तो क्या हुआ?
समय दाह पिघला अयस ठहरा हुआ
तड़प की धार छौंक छन छनछनाये है।

लिपटो अंग अंगना कि मुझे पूरी करना 
तुम्हारी वह अधूरी रचना – 
देह उत्सव पिघले शरीर 
स्वेद कण कपूर बन जल रहे तीर तीर …  

आज ‘नरक के रस्ते’ से एक अंश

ये लाल किले की प्राचीर पर 
कौन चढ़ गया है ?
सफेद सफेद झक्क खादी। 
लाल लाल डॉलर नोट
लाल किला सुन्दर बना है
कितने डॉलर में बना होगा ..
खामोश 
देख सामने
कितने सुन्दर बच्चे! 
बाप की कार के कंटेसियाए बच्चे
साफ सुथरी बस से सफाए बच्चे 
रंग बिरंगी वर्दी में अजदियाए बच्चे 
प्राचीर से गूँजता है: 
मर्यादित गम्भीर 
सॉफिस्टिकेटेड खदियाया स्वर 
ग़जब गरिमा !
”बोलें मेरे साथ जय हिन्द !”
”जय हिन्द!”
समवेत सफेद खादी प्रत्युत्तर 
“जय हिन्द!“
”इस कोने से आवाज धीमी आई
एक बार फिर बोलिए – जय हिन्द” 
जय हिन्द , जय हिन्द, जय हिन्द
हिन्द, हिन्द, हिन् …द, हिन् ..
..हिन हिन भिन भिन 
मक्खियों को उड़ाते 
नाक से पोंटा चुआते 
भेभन पोते चन्नुल के चार बच्चे
बीमार – सुखण्डी से।
कल एक मर गया।
अशोक की लाट से 
शेर दरक रहे हैं 
दरार पड़ रही है उनमें ।
दिल्ली के चिड़ियाघर में 
जींस और खादी पहने 
एक लड़की 
अपने ब्वायफ्रेंड को बता रही है,
”शेर इंडेंजर्ड स्पीशीज है 
यू सिली”।

कितने दिन?

कितने दिन हुये आसमान पर बादलों से चित्र बनाये हुये? 
कितने दिन हुये अनगढ़ मन्दिर अनाम देव मन्नत माँग मुस्काये हुये?
कितने दिन हुये रास्ते के पेंड़ से उसका हाल चाल पूछे हुये?

  

कितने दिन हुये पत्ती पर अटकी ओस को निहारे हुये? 
कितने दिन हुये झाँकती इन्द्रधनुषी बाला को सराहे हुये? 
कितने दिन हुये जमीन पर व्यस्त चीटियों को गिने हुये?

  

कितने दिन हुये गर्म रोटी से आती भाप से हाथ जलाये हुये? 
कितने दिन हुये आईने पर मुक्का ताने हुये? 
कितने दिन हुये बिना बात ही सिर खुजाये हुये?

कसाईखाने में कंडोलेन्स

कसाईखाने में कंडोलेंस है।
कोई खस्सी नहीं,
एक चिकवा हलाल हुआ है।

बात बस इतनी थी
झटका और हलाल चिकवों में
बहस हुई – झटका अच्छा कि हलाल?
बहस से तू तू मैं मैं
तू तू मैं मैं से माँ बहन
माँ बहन से पटका पटकी
और उसके बाद
हलाल वाला हलाल हो गया।

झटकासिंह ने घूम घूम कर
सबको सफाई दी,
“उसे मारते हुये वे वाहियात कलमे भी पढ़े
जो इतने दिनों सुनते सुनते
हो गये थे मुझे याद।

मैंने उसे झटके से नहीं
हलाल कर मारा
जिबह किया। 
उसकी आस्था का खयाल रखा 
भले मेरी आस्था खंडित हुई। 
यही तो भाईचारा है
यही इंसानियत है!”
और 
इंसानियत की कदर के कारण 
उसे जमानत मिल गई।  
खस्सियों ने आयोजित की 
एक शोकसभा। 
“कितना मासूम और पाक लगता था!
हलाल अली।
उसे यूँ मार कर झटकासिंह ने 
इंसानियत को शर्मसार किया।” 
थू थू किया
सारे खस्सियों ने एक साथ।  
मरियल सी आवाज में
एक दुबला खस्सी बोला,  
“हलाल अली हो या झटकासिंह 
हमें तो मारते ही थे।
हमें तो मारते ही हैं।        

हमें तो मरना ही है।”
खड़ा हुआ एक खस्सी
दिव्य तेजधर
सुमुख और सुन्दर,
“कुफ्र की बातें न करो।
हमें तो मरना ही है
हम बने ही इस लिये हैं।
कंडोलेंस का दस्तूर तक नहीं
हमारे लिये।

किंतु सोचो जरा 

क्या हलालअली को ऐसे मरना था?
जुटो सभीएक जगह!
हलालअली के लिये
हम मौन रखें।”  
मरियल खस्सी ने
अपनी बात पुख्ता करने की
एक बार फिर कोशिश की।
लेकिन
चिल्ला उठे सभी खस्सी एक साथ –
कंडोलेन्स होना ही चाहिये
यही पशुता है।
और फिर हो गये लीन
मौनमुद्रा में।

जमानत मिलने की खुशी में झटकासिंह
ले गया दावतनामे को एक खस्सी अपने घर
जो था दिव्य तेजधर, सुमुख और सुन्दर।
खस्सियों ने मौन नहीं तोड़ा।
इन्सानियत और पशुता के दस्तूर जारी हैं
कसाईखाने में कंडोलेन्स जारी है।