कजरी

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सी!

छन छपी है धूप बगीची बीच सुबह सुबह
निफूले हरसिंगार तले तुम्हारी हँसी सी!
टँगी ओस अदद एक शमी की झुकी पत्ती पर 
सद्य:स्नात केश बूँद अकेली नयनाँ बसी सी!
उजली जमीं फेंक गया कोई लाल फूल कनैल तले
टोने टोटके वारी सब गोरे हाथ मेंहदी कसी सी

…वे आयेंगे

वे आयेंगे, जब गीत मुरझायेंगे
होठों को सिकोड़ देंगी झुर्रियाँ
और नैन सूख जायेंगे, वे आयेंगे
मुस्कुराते हुये गायेंगे मुकरियाँ
और हम न समझ पायेंगे!

बस!

कभी ऐसा भी होता है कि
शब्द खोने लगते हैं
और मन हो जाता है
क्षितिजहीन सपाट पठार;
मैं खोये को पाने को
अस्तित्त्वहीन क्षितिज से घिर जाने को
कुछ लिखता हूँ,
जो काव्य नहीं होता।
अपने क्षितिज से जोड़ उसे
न पूछो प्रश्न
न करो कोशिश
हरियाली की समस्यायें
रोपने को पठार पर।
उस कुछ में समाधान नहीं होता
उस कुछ से समाधान नहीं होता
वह बस खोये को पाने को है
वह क्षितिज तक जाने को है – बस!

दो पाट, स्त्री और कुँवारा

जब जाना कि प्रेम में हूँ 
प्रतीक्षा के दो पाट हुये 
एक नदी बह चली कल कल – स्त्री। 
झूठे पुरोहितों ने कहा 
ईश्वर ने मेरी पसली से गढ़ी – स्त्री। 
आश्चर्य नहीं कि वह अब तक कुँवारा है।

आश्चर्य!

आसन्न मृत्यु की स्थिति में
होती है अधिक आशावन स्त्री
जीवन की ओर, पुरुष की तुलना में
वह जननी, जीवनदायिनी,
प्रेम वात्सल्य।
जीवन ज्योतिष के पन्नों में
स्त्री प्रतीक भरनी नक्षत्र का देवता- यम
आश्चर्य!