दीप जला रे!

भ्रमित अहं मन अहन गिने रे 

सूरज ने हारे अंधेरे 
प्रीत द्यूत की जीत मना रे 
दीप जला रे! 
नायक चाप शर भङ्ग हिले 
हंता मन में मोद खिले 
आँखें जब हों दीर्घतमा रे
दीप जला रे! 
दिशाशूल सब सङ्ग मिले 
यात्रा के बहुपंथ भले 
सब भूलों की माँग क्षमा रे
दीप जला रे! 
इस रात विपथगा गङ्ग चले
पूनम में न आस दिखे 
तेरस को भी मान अमा रे 
दीप जला रे! 
रुद्रों के सरबस शूल चले 
भगीरथों के कंध छिले 
दुखते पापों के भार सदा रे
दीप जला रे!

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कृष्ण अस्त्र

कुमुद कौमुदी गदा देवी,

सहस्रार चक्र सु-दर्शन,
वनमृग शृङ्ग शार्ङ्ग चाप,
पाञ्चजन्य पञ्चजन आह्वान –

मैं जीवन में एक बार

केवल एक बार
हुआ स्तब्ध !
कुरु सखी पाञ्चाली विवश
सभा में दिगम्बरा आसन्न,
हाहाकार,
मौन देखते अनर्थ युग के
धर्म और बल धुरन्धर
मौन रह मैं बना अम्बर,
लौटा चुपचाप सत्वर।

उस दिन मेरी वेणु से
टूटा संगीत,
बाँध दिया उससे कषा,
अश्व हाँकने को –
महाविनाश की भूमिका मौन
मैं लौटा था चुपचाप
बाहर भीतर रथचक्र तक
सब स्तब्ध
कर्णमाधुरी हुई नष्ट।
हो गया विनाश,
भावी का अङ्कुर हत ब्रह्मशर,
केवल एक बार,
उमड़ी थीं ऊर्मियाँ अनन्त
केवल एक बार,
ली सौंह मैंने, अपने समस्त शुभ कर्म
रख दिये मानो निकष द्यूत पाश।
नवजीवन नवयुग नवनिर्माण
का पहला परीक्षित प्रस्तर
अमृत।
जानते हो?
वेणु भी हुई मुक्त
कषा के हिंस्र काषाय से,
रात भर मैंने बाँसुरी बजायी थी,
और
किसी ने न सुनी !
गाया सूतों ने
लिखा लोमहर्षण ने, सौती ने
कोई नहीं सुनता, कोई नहीं सुनता
यद्यपि मैं हाथ उठा उठा कहता।
मैं मुस्कुराता रहा वैकुण्ठ से –
रे सूत, वे स्वर मौन
सुनते हैं वे सब
जो रथ हेतु वेणु तजते हैं –
यह पृथ्वी,
ये सूर्य चन्द्र ऐसे ही थोड़े चलते हैं!

कृष्ण वेणु

मनु के जने मुझे सुनते हैं,

और मैं तुम सब को।

बोलो, क्या बजाऊँ?

कालिन्दी की कल कल

या

गइया के दूध की,
गगरी में झर झर?
क्या सुनना है?
कहो, कहो!
कहो न!!

कैसे?

मैल भरे मेरे चैल तुम तक छैल आऊँ कैसे? 

राग विराग न मधु पराग उस शैल जाऊँ कैसे? 
शुचि गहन अमा अन्धेरा गर्भगृह का देव पर, 
दीप जले ताख राख से हाथ बचाऊँ कैसे? 
तुम्हारी पगधूलि ली भाल कि तुम ऊँचे उठो, 
तुम्हीं दो शाप तो कहो किसी को बताऊँ कैसे? 
अधीर ओठों के अनल आँखों की बड़वागि तक, 
भाल चन्दन पिघले शङ्ख चुम्बन चढ़ाऊँ कैसे? 
स्फटिक शिलायें जड़ी हैं तुम्हारे घर कुट्टिम पर, 
मैल सने बिवाई भरे पाँव ले कर आऊँ कैसे?

हिन्दी ‘कबी’, जिसे न व्यापे जगत गति…

जिसे न व्यापे जगत गति, मत्त सदा वह बहता है। 
आग लगी जो गाँव में, पर्याय अनिल वह पढ़ता है। 
गाता है जिस पर बसन्त में, छिप कर सुख चैन से,
आम के पतझड़ में कोयल, कौवों की बात करता है।
ज्ञान आलोक से जिसके, चौंधियाती आँखें सबकी,
मन का काला श्याम कह, भजन कृष्ण के रचता है।
बजते हैं मृदङ्ग जब भी, अस्तित्व रण के सम्मान के,
नायक बता कर्कश ‘कबी’, मधु रागिनियाँ गढ़ता है।
वह समूह जो बच गया, हताहत कवचों के उद्योग से,
रच रच कुण्डलियाँ जात की, त्रिकालदर्शी बनता है। 

कोई

महरूम आफताब से है दयार कोई, 

तारीकी में ढूँढ़ता कूचा-ए-यार कोई !
मजा लिया बहुत दोस्ती के बोसे में, 
चन्द दिन दुश्मनी रहे गुजार कोई। 
खुश है पतझड़ में बहेलिया बहुत, 
जाल उसकी फँसी है बहार कोई। 
नशेड़ी आँखें संग बिखरी जुल्फों के,
बुलावा भेजो जो दे अब सँवार कोई।
खामोशी सुकूँ नहीं न अश्फाक है, 
थकी समा में भटकती पुकार कोई।

पटाखे फूटे हैं।

पटाखे फूटे हैं। 
वे हथौड़े टूटे हैं 
जिन के हत्थे चार
तथा मुग्दर पाँच बार
परिवर्तित किये, 
दस नम्बरियों ने
बीस सूत्रियों ने
मेधा पर सवार
चूतियों ने। 
जो समझते हैं कि
शेष है घनक
अशेष है हनक
बालकों की छुन्नियों से
उनके केतु टूटे हैं, 
पटाखे फूटे हैं। 
पटाखे फूटे हैं 
उनके गाँव 
जिसके ठाँव 
ठूठे हैं। 
पटाखे फूटे हैं।

द्विपदियाँ

गर्व वह पानी है,
जो बहल जानी है।
वदन जो रूखा है,
लो, ये रुखानी है।
सजी राजनय युवा,
देश जरा आनी है।
खेत बँटा मेंड़ जो,
आँगन कहानी है।
बोतल के बन्ध अब,
सागर है पानी है।
लटक रही तार पर,
सबकी जवानी है।

जवनिकायें असित

जवनिकायें असित तनने लगी हैं,
टोपियाँ जाली चुभने लगी हैं।
पड़ी जान सासत में देखो हमारी,
कसाइनें सभत्तर कहने लगी हैं।
उपज की मारी खेतियाँ तुम्हारी,
बस करो बस करो रोने लगी हैं।
जमजम पानी तसबीह जुबानी,
अरे राम, हरे राम जपने लगी हैं।
नीर जिनकी कहानी पत्थर की मारी
कुटनियाँ सयानी बनने लगी हैं!