उदास द्विपदियाँ -26 जनवरी पर

जिस दिन खादी कलफ धुलती है।
सजती है लॉंड्री बेवजह खुलती है।

फुनगियों को यूँ तरस से न देखो,
उन पर चिड़िया चहक फुदकती है।

बहुत है गुमाँ तेरी यारी पर दोस्त,
सहमता हूँ जो तुम्हारी नज़र झुकती है।

ये अक्षर हैं जिनमें सफाई नहीं
आँखों में किरकिर नज़र फुँकती है।

गाहे बगाहे जो हम गला फाड़ते हैं,
चीखों से साँकल चटक खुलती है।

रसूख के पहिए जालिम जोर जानी,
जब चलती है गाड़ी डगर खुदती है।

आईन है बुलन्द और छाई है मन्दी,
महफिल-ए-वाहवाही ग़जब सजती है।

साठ वर्षों से पाले भरम हैं गाफिल,
जो गाली भी हमको बहर लगती है।

सय्याद घूमें पाए तमगे सजाए
आज बकरे की माँ कहर दिखती है।

पथराई जहीनी हर हर्फ खूब जाँचे,
ग़ुमशुदा तलाश हर कदम रुकती है।

खूब बाँधी हाकिम ने आँखों पे पट्टी,
बाँच लेते हैं अर्जी कलम रुकती है।

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तुम्हारी कविताई

पारदर्शी पात्र
सान्द्र घोल।
तुमने डाल दी 
एक स्याही की टिकिया
धीरे से।
रंग की उठान
धीरे धीरे 
ले रही आकार।

जैसे समिधा 
निर्धूम प्रज्वलित,
समय विलम्बित
बँट गया फ्रेम दर फ्रेम।
..कि 
आखिरी आहुति सी
खुल गई
अभिव्यक्ति एकदम से !

तुम्हारी कविता
बना गई मुझे द्रष्टा
एक ऋचा की।

पुरानी डायरी से -11 : … मैं बूढ़ा हो गया …

22 मई 1992, समय:__________                                                          …. मैं बूढ़ा हो गया …

सुबह सुबह आज 
दाढ़ी बना रहा था।
थोड़ा सा एकांत देख
बीवी ने कहा
सुनते हो, बिटिया सयानी हो गई है
कहीं बातचीत तो करो ! 


उसी पल 
शीशे में कनपटी के बाल सफेद हो गए।
चेहरे की झुर्रियाँ उभर कर चिढ़ाने लगी मुँह । 
आँखें धुँधली हो गईं।
उसी पल
मैं बूढ़ा हो गया।
… मेरे भीतर कुछ टूट गया। 

पुरानी डायरी से -12 : श्रद्धा के लिए

13 दिसम्बर 1993, समय:__________                                 श्रद्धा के लिए


तुम्हारा बदन 

स्फटिक के अक्षरों में लिखी ऋचा  
प्रात की किरणों से आप्लावित
तुम्हारा बदन।


दु:ख यही है 
मेरे दृष्टिपथ में 
अभी तक तुम नहीं आई।
कहीं  ऐसा तो नहीं 
कि तुम हो ही नहीं !
नहीं . . . . 

पर मेरी कल्पना तो है – 
“तुम्हारा बदन 

स्फटिक के अक्षरों में लिखी ऋचा
प्रात की किरणों से आप्लावित
तुम्हारा बदन।”


री !

सुरसरि तट
सर सर लहर सुघर सुन्दर लहर कल कल टल मल सँवर चल कलरव रव री !
______________________________________
हिन्दी कविता के प्रयोगवादी दौर में एक वर्ग ऐसा भी रहा जो छ्पे हुए शब्दों को भी एक तार्किक समूह में कागज पर रख देने का हिमायती था ताकि कविता की लय (अर्थ और विचार दोनों) छपाई तक में दिखे। उतना तो नहीं लेकिन सुधी जन की टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए यति की दृष्टि से पंक्तियों में तोड़ दें तो कविता यूँ दिखेगी:
_____________________________________
सुरसरि तट

सर सर लहर सुघर सुन्दर
लहर कल कल टल मल
सँवर चल
कलरव
रव री !




देह गन्ध … सिद्धि हुई जीवन की।

स्मरण दिवस प्रिये
निमंत्रण देह गन्ध
पहली बेला महकी।



वलय वृत्त गणित
सौन्दर्य सृष्टि अपार
केवल सन्तति हेतु ?



तुमने रचा संसार
मधु राग राग स्वर
आभा नृत्य अभिसार ।



अधर मार्दव चूम  
दाड़िम दंत पखार
स्पर्श सुख सहसा सा।



रोम रोम रस धार
छाया विद्युत प्रवाह
कसा बसा आलिंगन।



टूटे बन्ध देह मुक्त
तड़प उठी बिजली
लयकारी सिसकी की।



साँसे ऊष्ण संघर्षण
दो एकाकी हुए एक
आहुति अर्घ्य संगति।

  
प्लवित मन सकार
नेह झील पूरन सी
सिद्धि हुई जीवन की।

संक्रांति संग जाएगा बचपना

घर में आइस पाइस*
ठिठुरन संग।
छुपा हूँ रजाई में।

ठिठुरन देखती
पकड़ नहीं पा रहीIMG213-01
कह नहीं पा रही
– वो: देखो !

रोज होता ऐसा 
पर आज ठिठुरन
आई संक्रांति सहेली संग।
संक्रांति बेशरम
खींचती है रजाई

नहाने को कहती है।
संक्रांति आई है
बस एक दिन के लिए
ठिठुरन सहेली संग जाएगी
अनजान देश।

मैं भी खुश
चलो ठिठुरन संग
जाएगा बचपना भी
रजाई में दुबक छिपना।

कितना अजीब !
सहेली के जाने पर भी
यूँ खुश होना।

आज मित्र बसंत की पाती आई है।
आने का वादा किया है।
_________________
* आइस पाइस – लुका छिपी का खेल।