देहात – साँझ, रात, भिनसार

साँझ
नहीं ठाँव
तारों के पाँव।


पीपल
पल पल
जुगनू द्ल।


गीत
सुने माय
मुँह बाय।


पावर
रोशनी कट
ढेबरी सरपट।


चाँद
फेंक प्रकाश
लानटेन भँड़ास।


मच्छर
गुमधुम
लोग सुमसुम।


श्वान
संभोग दल
रव बल छल।


फूल
पौधों के शूल
रजनी दुकूल।




ओस
रही कोस
बारिश भरोस।


….
….
बयार
हरसिंगार
धरती छतनार।

_________
ये हिमांशु जी की टोकारी पर:

सेंक
रोटी फेंक
चूल्हा टेक।
__________ 

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अन्ना ! नहीं तोड़ा जाता ।

तुम्हारी उंगली पकड़ 
यहाँ मैंने चलना सीखा ।
पैर कहाँ रखें कैसे रखें 
तुमसे सीखा ।
तुमसे हुए जाने कितने सम्वाद 
सुलझाते रहे गुत्थियों को।


अचानक इतने चुप क्यों हो गए?
चुप्पी भी ऐसी कि कुरेदने से न टूटे !
….
मौन तुम्हारा अपना वरण है।
मुझे उस पर कुछ नहीं कहना ।
लेकिन मैं अब किसे ढूढूँ 
अपना मौन तोड़ने को ?
…..
भीतर का हाहाकारी मौन 
जिस किसी के आगे नहीं तोड़ा जाता
अन्ना ! नहीं तोड़ा जाता।

या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धा रूपेण संस्थिता..

कई दिनों बाद लौटा हूँ । घमासान (जाने इस शब्द का सही प्रयोग कर रहा हूँ कि नहीं, टिप्पणियों को भी देखें) देख कर हैरान हो रहा हूँ। 
एक training पर गया था जिसे वे लोग learning कहते थे इस तर्क के साथ कि वयस्कों को train नहीं किया जा सकता उन्हें स्वयं learn करना होता है- साशय, वह भी निष्ठा के साथ।
उन लोगों ने खास उपनिषद सूत्रों को बहुत घोंटा। उलटा, पलटा, रगड़ा , मसला ….. अपनी मान्यताओं में वे इतने निश्चिंत थे कि मुझे उनके वयस्क होने में ही शंका होने लगी। मुझे लगा कि केवल बच्चे ही इतने निश्चिंत हो सकते हैं…..

संस्कृत से भय खाने वालों से क्षमा सहित पंक्तियाँ उद्धृत कर रहा हूँ। चूँकि ब्लॉग जगत में अपनी मान्यता को गोड़ पटक कर(भले हड्डियाँ चरमराने लगें) कहने की प्रथा का विस्तार/प्रसार हो रहा है इसलिए मैं भी कह रहा हूँ (नौसिखिया को पता है कि कुछ ऐसी गड़बड़ हो सकती है जो दूसरों के गोड़ोंको उसकी पीठ और कुल्हों की ओर आकर्षित कर सकती है, फिर भी कह रहा है):
संस्कृत या तत्सम शब्दों से डरने वाले या डरने का पाखण्ड करने वाले दोनों हिन्दी का अहित कर रहे हैं।‘…मैं हिन्दी की बात कर रहा हूँ, केवल ब्लॉगिंग की नहीं ब्लॉगिंग एक अंग भर है।
....
…….
पंक्तियाँ हैं:
असतो मा सद्गमय
तमसो मा ज्योतिर्गमय
मृत्योर्माSमृतंगमय
ॐ शांति: शांति: शांति:
…. .
वयस्क बच्चों से मुझे बड़ा डर लगता है। देहरादून से भी उपर एक आधुनिक जंगली गुरुकुल में जब पूरी टीम को इनवाल्व(?) कर उपर्युक्त सूत्रों को घोंटा जा रहा था तो मारे डर के मेरी घिघ्घी बँध गई थी। मैं जड़ हो गया। कुछ बोल नहीं पायाबच्चे बड़े प्रसन्न थे।
कल नवरात्र के प्रथम दिवस के उपवास (नास्तिक भी यह सब करते हैं) के बाद आज घर लौट कर प्रसन्न था कि बहुत दिनों के बाद तसल्ली से ब्लॉग लेखों का पारनकरूँगा। तभी यहाँ नज़र पड़ी। अनायास ही फिर वही सूत्र मन में घूमने लगे। सोचा कि डर को भगा कर अपनी व्याख्या लिख ही दूँ….
कोई भी परिवेश विरुद्ध प्रवृत्तियों का समुच्चय होता है। किसी भी चिंतन की श्रेष्ठता का निकष होता है इन प्रवृत्तियों का पूर्ण स्वीकार। स्वीकार के बाद ही आगे बात बढ़नी चाहिए। भारतीय चिंतन का आधार यही है (विदेशी मैंने नहीं पढ़े)। सूत्रों को देखें तो निम्न युग्म सामने आते हैं:
असत सत
तमज्योति
मृत्यु अमरत्त्व
सबमें पहले अवांछित को स्वीकारा गया है, फिर वांछित की प्राप्ति की कामना की गई है। अवांछित हमेशा रहेंगे लेकिन महत्त्वपूर्ण है कि वांछित की कामना भी हमेशा रहनी चाहिए। अवांछित और वांछित के स्वीकार और संतुलन भाव से आगे बढ़ कर चिंतन मात्र वांछित की कामना करता है। इसे सधाव कहते हैं उन्नति की ओर, प्रखर, स्पष्ट और श्रम से पलायन न करने वाला इस चिंतन में अवांछित का स्वीकार मखौल में आकर उसे ही साधने नहीं लगता या उसे ही न्यायसंगत नहीं कहने लगता। उसके लिए तर्क नहीं जुटाता। यह चिंतन उससे आगे बढ़ता है
आगे बढ़ने पर भी यह चिंतन अवांछितको भूलता नहीं। उसे निरंतर पता है कि अवांछित रहेगा और इसलिए वांछित की चाहना भी शाश्वत रहेगी। इस युग्म संघर्ष में शांति की चाह भी रहनी चाहिए तभी तो तीन युग्मों के लिए तीन बार शांति शांति शांति कहा गया है वह भी नाद ब्रह्म का सम्पुट दे कर। शांति परिणाम ही नहीं प्रक्रिया भी है। शांत मस्तिष्क सृजन करता है। यहाँ तक कि सीजोफ्रेनिया और अन्य मस्तिष्क विकारों से ग्रस्त विभूतियाँ भी शांत हो कर ही सृजन कर पाई हैं। विश्वास मानिए ऐसा सृजन उत्कृष्ट होता है। …. मुझे लगता है कि मैंने पर्याप्त संकेत दे दिए हैं।
….
….
नवरात्र पर्व जारी है हिन्दी ब्लॉगर जन ! प्रार्थना करें:
या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धा रूपेण संस्थिता“….. श्रद्धा को मानस में स्थान दें और सोचने में ईमानदार रहें। हिन्दी का हित इसी में है। अभिव्यक्ति की एक नई विधा ब्लॉगके आप आदि जन हैं। अपनी जिम्मेदारियों और उनकी गुरुता के प्रति सचेत रहें….

पुरानी डायरी से – 2

…. अपनी पुरानी डायरी आप के सामने खोलना प्रारम्भ कर रहा हूँ – पन्ने दर पन्ने , बेतरतीब । डायरी रोजनामचा टाइप नहीं बल्कि सँभाल कर छिपा कर किए प्रेम की तरह – जब मन आया लिख दिए, जब मन आया चूमने चल दिए, बहाने चाहे जो बनाने पड़ें। 
नई जवानी में बचपना अभी शेष है लेकिन आश सी है कि इन पन्नों को भी उतना ही प्यार दुलार मिलेगा।
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इसके पहले पुरानी डायरी से – 1


6 अप्रैल 1993, समय: रात्रि 1110                                ‘नश्वर’

हाँ यह शरीर नश्वर !
पूजित पहचान अमर
हाँ यह शरीर नश्वर।


स्वागत तिरस्कार
सौन्दर्य अभिसार
जीवंत काम अध्वर
हाँ यह शरीर नश्वर।


नीड़ का निर्माण
वेदना निर्वाण
उद्घोष प्राण सस्वर
हाँ यह शरीर नश्वर।

पुरानी डायरी से – 1

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नया जवान होता व्यक्ति अभिव्यक्ति के सागर जेब में लिए चलता है। जेब भी कैसी ! पानी तक न टपके। जब जरूरत हो तो निचोड़ कर ऐसी टपकाए कि बस ….
थोड़ा रूमानी और ताक झाँक वाला स्वभाव हो तो क्या कहने ! 
आज अपनी पुरानी डायरी आप के सामने खोलना प्रारम्भ कर रहा हूँ – पन्ने दर पन्ने , बेतरतीब । डायरी रोजनामचा टाइप नहीं बल्कि सँभाल कर छिपा कर किए प्रेम की तरह – जब मन आया लिख दिए, जब मन आया चूमने चल दिए, बहाने चाहे जो बनाने पड़ें। 
नई जवानी में बचपना अभी शेष है लेकिन आश सी है कि इन पन्नों को भी उतना ही प्यार दुलार मिलेगा।
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9 मई 1992                          ‘झुलसा सारा गाँव’

आज चाँदनी के आगन में, गरमी धरती पाँव
झुलस गए सब फूल पतंगे, झुलसा सारा गाँव।


सूख गए सब ताल तलइया
कोयल छोड़ चली अमरइया
गिद्धों के उन्मुक्त भोज में
कउवे बोलें काँव
झुलसा सारा गाँव।


भाग चले सब छोड़ घोंसले
मन में जलता काठ कोप ले
भाग दौड़ छीना झपटी में
सधते सबके पाँव
झुलसा सारा गाँव।


दीप दिवाली होली गाली
खा गइ सभी अमीरी (?) साली
नए ठाँव के नए ठाठ में
चलती कागज की नाँव
झुलसा सारा गाँव।  
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