बस!

कभी ऐसा भी होता है कि
शब्द खोने लगते हैं
और मन हो जाता है
क्षितिजहीन सपाट पठार;
मैं खोये को पाने को
अस्तित्त्वहीन क्षितिज से घिर जाने को
कुछ लिखता हूँ,
जो काव्य नहीं होता।
अपने क्षितिज से जोड़ उसे
न पूछो प्रश्न
न करो कोशिश
हरियाली की समस्यायें
रोपने को पठार पर।
उस कुछ में समाधान नहीं होता
उस कुछ से समाधान नहीं होता
वह बस खोये को पाने को है
वह क्षितिज तक जाने को है – बस!

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