कभी हो मेरे यार

उद्धरण

कभी हो मेरे यार कि यूँ ही जान मिलें

बहते पत्तों सी रवानी फिर जुबान सिलें।  

तमाम जिल्दें हों साया हमारी खामोशी    

पलटें पन्नों की खड़खड़ बस अहान मिलें।

यूँ कहना तुम्हारा और सुनना हमारा

छुयें सूरज सौ सरवर कमल हजार खिलें।  

Advertisements

काँटे

http://primej.blogspot.in/2009/11/thorns.html

काँटे

बीज बन पड़ते हैं

पहली साँस के साथ।

काँटे

उगते हैं

दूध की पहली धार के साथ।

काँटे

बढ़ते हैं

किलकिल भरी घुटनिया चाल के साथ।

काँटे

चुभते हैं

पीठ भर सीख की दुखन के साथ।

काँटे

घुसते हैं

अस्थियों के पूरे दो सौ छ: घटने तक।

काँटे

फिर पड़ते हैं

एक से दो होने पर।

काँटे

फिर उगते हैं

सृजन की पहली साँस के साथ।

काँटे

बढ़ जाते हैं अचानक

राह के आधे बच जाने पर।

काँटे

लहूलुहान करते रहते हैं

आधी राह पूरी होने तक।

काँटे

बोलते हैं

मृत्यु पश्चात सम्वेदना सन्देशों में।

काँटे

जड़ते हैं

हर व्यक्ति के सीने अच्छाई का प्रमाणपत्र।

काँटे

मरते हैं

ईश्वर के साथ प्रलय पश्चात।

~~~~~~~~~~~~~~~~~

(चित्राभार: http://primej.blogspot.in/2009/11/thorns.html)

मुहब्बतों की तमाम बातों में…

फूल रखा है तुम्हारे सामने कहते हो कि पत्थर है
तो सिर से लगाना सँभाल रखना इसे शालिग्राम की तरह।
चमकते तो खूब हो पर लोगों को कसौटी चाहिये
घिस देना खुद या कह देना घिसने को बात बन जायेगी
खुशबू मिले तुम्हें न मिले इसकी शख्सियत तुमसे चमक जायेगी।
सूख जायेगा जब तो जानोगे कि था वाकई एक फूल
खुशबू उड़ जायेगी भेंट रह जायेगी,
मुहब्बतों की तमाम बातों में एक और बात जुड़ जायेगी।

कौन पढ़ेगा?

फूल पन्नों के बीच मुरझाते नहीं,
मिल कर अचानक नम आँख से,
भर उदासी खिलखिलाते नहीं।

– मोबाइल बदलता है और एस एम एस ग़ायब हो जाते हैं –

न किसी के इंतज़ार में चेहरा होता लाल धूप में
न एक माँ की डाँट चन्द कतरे टाँकती रूप में
न किसी के भाल का रोली चन्दन मन्दिर बुलाता है।

– हाथ कवर, चेहरा कवर, धूप ढलते कोई और अपना हो जाता है –

अब गतिमय संसार में ठहरना पिछड़ना हो जाता है
कौन पढ़ेगा तुम्हारी कहानी, बरसों पुरानी
अब भी लिखते ठहर जाती है जो?

सबसे ऊपर अब भी संडास है।

धनिया उदास है, पानी की तलाश है
कपड़े पर दाग है
न उठता झाग है
न बनता साग है
रहता कच्चा भात है, धनिया उदास है।

गोबर खाद है, ऑर्गेनिक नाम है
बड़का दाम है
खेती नाकाम है
बढ़ गया काम है
फोकट दाम है, गोबर खाद है।

धनिया उदास है, नीति बकवास है
सरकार नाग है
सिमटा लाभ है
घटती माँग है
पूर्ति अभिलाष है, धनिया उदास है।

धनिया बहलाने को, गोबर दुलराने को
धनिया सहलाने को, बैठक आज खास है
तेज सबकी साँस है
धनिया सु-दास है
गोबर की आस है
थरिया उपास है
करने को बकवास है, बैठक आज खास है।

हवा में बास है कि मन में आस है
समझ नहीं आता समझता खास है
बउरा गया आम
भरता उसाँस है
उदास इजलास है
कुत्तों ने उतार ली, चादर चाम है
चीर फाड़ चट्ट का, सुन्दर नाम है।

बात बताने को, इशारे समझाने को
लंगोटी पहनाने को, नंगई भुलवाने को
कविया संडास है
हगता भँड़ास है
कमरा गन्धास है
बाहर फुलवास है
पागलपंथी छोड़ कर, पहुँचा विभाग है
बैठक जमी बकवास, लग गया दिमाग है।

तो अंत में क्या बचा?
तो अंत में क्या रहा?
एक नाम दुइ काम, धनिया अब भी उदास है।
गोबर खाद है
बकवास है
बैठक खास है
सरकार नाग है
सिमटा लाभ है
घटती माँग है।

दिमाग है तो मत कहो कि अब भी
हाँ, अब भी – थरिया उपास है
वरना फिर से फिर फिर
इजलास है
बैठक आज खास है
तेज सबकी साँस है
गन्धास है
सबसे ऊपर अब भी संडास है।