कौन पढ़ेगा?

फूल पन्नों के बीच मुरझाते नहीं,
मिल कर अचानक नम आँख से,
भर उदासी खिलखिलाते नहीं।

– मोबाइल बदलता है और एस एम एस ग़ायब हो जाते हैं –

न किसी के इंतज़ार में चेहरा होता लाल धूप में
न एक माँ की डाँट चन्द कतरे टाँकती रूप में
न किसी के भाल का रोली चन्दन मन्दिर बुलाता है।

– हाथ कवर, चेहरा कवर, धूप ढलते कोई और अपना हो जाता है –

अब गतिमय संसार में ठहरना पिछड़ना हो जाता है
कौन पढ़ेगा तुम्हारी कहानी, बरसों पुरानी
अब भी लिखते ठहर जाती है जो?

Advertisements

सबसे ऊपर अब भी संडास है।

धनिया उदास है, पानी की तलाश है
कपड़े पर दाग है
न उठता झाग है
न बनता साग है
रहता कच्चा भात है, धनिया उदास है।

गोबर खाद है, ऑर्गेनिक नाम है
बड़का दाम है
खेती नाकाम है
बढ़ गया काम है
फोकट दाम है, गोबर खाद है।

धनिया उदास है, नीति बकवास है
सरकार नाग है
सिमटा लाभ है
घटती माँग है
पूर्ति अभिलाष है, धनिया उदास है।

धनिया बहलाने को, गोबर दुलराने को
धनिया सहलाने को, बैठक आज खास है
तेज सबकी साँस है
धनिया सु-दास है
गोबर की आस है
थरिया उपास है
करने को बकवास है, बैठक आज खास है।

हवा में बास है कि मन में आस है
समझ नहीं आता समझता खास है
बउरा गया आम
भरता उसाँस है
उदास इजलास है
कुत्तों ने उतार ली, चादर चाम है
चीर फाड़ चट्ट का, सुन्दर नाम है।

बात बताने को, इशारे समझाने को
लंगोटी पहनाने को, नंगई भुलवाने को
कविया संडास है
हगता भँड़ास है
कमरा गन्धास है
बाहर फुलवास है
पागलपंथी छोड़ कर, पहुँचा विभाग है
बैठक जमी बकवास, लग गया दिमाग है।

तो अंत में क्या बचा?
तो अंत में क्या रहा?
एक नाम दुइ काम, धनिया अब भी उदास है।
गोबर खाद है
बकवास है
बैठक खास है
सरकार नाग है
सिमटा लाभ है
घटती माँग है।

दिमाग है तो मत कहो कि अब भी
हाँ, अब भी – थरिया उपास है
वरना फिर से फिर फिर
इजलास है
बैठक आज खास है
तेज सबकी साँस है
गन्धास है
सबसे ऊपर अब भी संडास है।

गुंजलक

शुभकामना सन्देश स्पैम बॉक्स में संख्या बढ़ाते हैं
स्वयं नहीं जाते तो भेज देता हूँ और सहमता हूँ
कहीं कोई सच्चा सन्देश तो नहीं चला गया उधर?
कहीं किसी शुभ की हत्या तो नहीं कर दी मैंने?
क्या करूँ कि मुझे सड़कों पर रोजमर्रा की वहशत दिखाई देती है?
क्या करूँ कि मुझे सड़कों पर रोजमर्रा की दहशत दिखाई देती है?
मैं क्या करूँ कि मेरे हाथ कई दिनों तक हटाते रहते हैं वह पत्थर
जिसे सड़क पर छोड़ दिया था किसी ने टायर बदलने के बाद?
मैं क्या करूँ कि होता रहता है हमेशा एहसास
कि मेरी ज़िन्दगी में कोई स्टेपनी नहीं –
खुद को देखता हूँ हजारो हजार सड़क भर भटकते।
क्या करूँ कि मुझे हो गई है स्थायी झुँझलाहट –
पत्थर उठा कर उस एस यू वी का नहीं तोड़ा कोई काँच एक?
स्याह शीशों के पीछे छिपे काले गुमनाम नामवर चेहरे
मुझे घूरते रहते हैं और मैं उन्हें देख तक नहीं पाता
मेरा संतुलन बिगड़ गया है,
क्या करूँ कि मुझे हमेशा चक्कर रहने लगे हैं?
मैं वह अकेला हूँ जिस पर अनुग्रह यूँ ही नहीं बरसते।
जब हजार लोगों की जमीन कब्जा होती है
जब बनता है दूसरे हजार लोगों की मौज को एक माल
तो मुझ पर गिरता है एक अनुग्रह।
गन्दी गली का मेरा मकान
अचानक ही राजमार्ग पर आ जाता है।
छत दबाती है मुझे, दीवारें सिकुड़ कर पीसती हैं
राजमार्ग के शोर से मेरी नींद हवा हो जाती है
मैं अचानक ही वी आई पी हो जाता हूँ –
मुहल्ले में पहले से और अकेला।
मेरे संगी हजार लोग हैं कोर्ट की फाइलों में पीलिया ग्रस्त
मैं रोगी हो गया हूँ।
________________
अच्छा  लगता है बीमार होना
कुछ दिन पड़े रहना कि
न खुद से खुद को कुछ उम्मीद रहे
और न दूजों को।
होता रहे यूँ ही खुदाई दीदार बराबर
भीतर मद्धिम आँच पर
कुछ पकता रहे बराबर –
अच्छा लगता है कुछ दिन
निज साँसों की महक का बदल जाना
जीने का अनुभव होता है नया
घट सकता है नया नित रोज –
तब भी जब कि बिस्तर पर पड़े रहें
और साँसें  तप्त होती रहें।
यह भान होता रहे
कि गरमी के सामान बाहर ही नहीं
भीतर भी हैं
और
गरमी चाहे जैसी हो
खुद ही झेलनी होती है।
झेलने की ताब बची है – अच्छा लगता है यह जानना।

उन सबकी गन्ध

मैंने पढ़ना छोड़ दिया है। न वह अकारथ नहीं था, लीकें तो उससे ही बनीं लेकिन मैं भर चुका था लबालब और कुछ साल पहले जो टूटी थी दीवार, अब तक बहे जा रहा हूँ। आऊँगा फिर से जब सूखा पड़ जायेगा। तब तक देखते रहना पानियों के रंग को, चखते रहना उनके स्वाद को, तुम्हें उन सबकी गन्ध मिलेगी।

सेत मेत

पिघलन बाहर
उफनी देह, क्लेद
अश्रु और स्वेद।

पिघलन भीतर
शीतोष्ण दाह
समय निर्वेद।

भीतर बाहर
केवल खेद
भेंट सेत मेत।

लगती हो

आभार:
 http://www.123rf.com/photo_4644624_indian-girl-catching-her-sari-in-a-bending-posture.html


जो पूछी बताता हूँ
अपनी सुनाता हूँ-
अमराई की पछुआ में
नशा छाँव महुआ में
नमकीन तीते टिकोरे कीखटाई सी लगती हो।
लूह चले चाम पर
परखन नाम पर-
जो दीठ से देखी न जाय
जीभ से कही न जाय
अधकच्चे रसाल कीभावी मिठाई सी लगती हो।
कने कने घाम में
सँवराई सी शाम में-
भटकन न नाप सके
डरा नहीं पाप सके
छूने की चाह जगाती, लजाती ललाई सी लगती हो।
.
.
.
छुट्टियों के दिन बीते
रह गये बखार रीते-
तड़पन जो ला न सकी
नेह लगन पा न सकी
सूने खलिहान लुटी, शहर की कमाई सी लगती हो।