आ रही होली – पुनर्प्रस्तुति

सड़क पर बिछे पत्ते
हुलस हवा खड़काय बोली

आ रही होली।

पुरा’ बसन उतार दी

फुनगियाँ उगने लगीं

शोख हो गई, न भोली

धरा गा रही होली।

रस भरे अँग अंग अंगना

हरसाय सहला पवन सजना 

भर भर उछाह उठन ओढ़ी 

सजी धानी छींट चोली। 

शहर गाँव चौरा’ तिराहे

लोग बेशरम बाग बउराए

साजते लकड़ी की डोली 

हो फाग आग युगनद्ध होली

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आज रंग है !

रंग हुड़दंग
अनंग संग भंग है
आज रंग है।

राति नींद नहिं आइ गोरि
सपन साँवरे भर भर अँकवारि
नशाय नसाय दियो उमंग है
आज रंग है।

चहका मन चमक चम
चौताल ताल नाचे तन
साजन बुढ़ाय पर
जवान जबर देवर देख
धधका बदन मदन संग
मचा जोबन सरर जंग
हुइ चोली जो तंग है
आज रंग है।

बौराया आम ढींठ हुआ
बयार के झँकोर बहाने
घेर गया नेह गन्ध ।
पड़ोसी की साँस सूँघ
तीत नीम मीठ हुई
फगुआ का संग है!
आज रंग है।

जाने कितने बरस बीते
मितऊ से बात किए ।
चढ़ाय लियो भाँग आज
कह देंगे दिल के राज
खींच लाएँगे आँगन बार
मिट जाँयगे बिघन खार-
लगाना तंगी को तंग है
आज रंग है।

नजर पिचकारी

फेर दो रे साजन नजर पिचकारी
न समझो मैं कारी
चढ़ जाएगी सारी नजर पिचकारी।

दाल में नमक ननदिया छिनारी
बिष बढ़ाई बाति महतारी पे डारी
न समझो मैं कारी।

मटकी थी भारी दही छलकी अनारी
सासु गारी दिहिन न सहाया मैं नारी
न समझो मैं कारी।

मेह ढलका नहीं मोरि अँखियाँ सकारी
जोत इनमें बसी तोरी नेहिया सँभारी
न समझो मैं कारी।

फेर दो न साजन नजर पिचकारी
चढ़ जाएगी सारी नजर पिचकारी। 

पुरानी डायरी से – 14: मस्ती के बोल अबोल ही रह गए

फाग महोत्सव में अब तक:
(1) बसन तन पियर सजल हर छन
(2) आचारज जी
(3) युगनद्ध-3: आ रही होली
(4) जोगीरा सरssरsर – 1
आज पुरानी डायरी उठाया – यह देखने के लिए कि फाग से सम्बन्धित कुछ मिल जाय। निराश हो ही रहा था कि एक टुकड़ा नीचे गिरा, देखा, आस बँधी, पढ़ा और फिर … कुछ मिला था लेकिन शिकायत भरा। कागज का वह टुकड़ा फाड़ कर अलग से डायरी में रखा था। देखने से लगता है कि दूसरी डायरी का अंश है। उस पर 12 मार्च दिन सोमवार अंकित है। समय सन्दर्भ के लिए पलटा तो अनुमान लगाया कि बात 1993 की होनी चाहिए (ज्योतिषी लोग ही बता पाएँगे कि ऐसे दिन होली कब पड़ी होगी, ये बात तो पक्की बता सकते हैं :))। एक सम्भावना यह भी है कि उस संवत में मैंने पुरानी डायरी बस दिनांक मिलाते हुए प्रयोग किया होगा। मध्यमवर्गी युवक उपहार में मिली डायरियों को ऐसे उपयोग में लाते रहे हैं। अस्तु..
अपनी तमाम डायरियाँ मैंने नष्ट कर दीं लेकिन इस टुकड़े को उस समय भी बचा लिया था।.. शिकायत पर हँसी आई। आदमी का मन भी अजीब होता है – जैसा खुद रहता है, आस पास भी वैसा ही ढूँढ़ लेता है। सुना है कि मिस्री पिरामिडों के शिलालेखों में भी ऐसी बाते पाई गई हैं जो कहती हैं कि ज़माना दिन ब दिन खराब होता जा रहा है। युवक उच्छृंखल होते जा रहे हैं... वगैरा वगैरा। 
..नष्ट की जा चुकी उस डायरी के इस बचे अंश में गाँव की होली के बारे में यह लिखा है:
06022010होली। उत्साह और प्राकृतिक ग्रामीण ढंग का आनन्द दिनों दिन कम होता जा रहा है।
उसके बाद दूसरे रंग की पेन से यह कविता है जिसमें पेंसिल से किए संशोधन भी दिखते हैं। साझा कर रहा हूँ:
ढोलक की थाप गई चउताल की ताल के गीत सारे बह गए।
रंगों की ठाठ गई, भाभियों के बोल अजाने जाने क्या कह गए।
बदल गए लोग बाग, बदली बयार अब, मीत सारे मर गए।
कचड़ा अबीर भया, भंग के रंग गए, मस्ती के बोल अबोल ही रह गए।
जाने क्यों आशंका सी उठ रही है – इस बार कहीं हिन्दी ब्लॉगरी की होली भी ऐसी न हो जाय ! … धुत्त जोगीरा ।

युगनद्ध -3: आ रही होली

सड़क पर बिछे पत्ते
हुलस हवा खड़काय बोली
आ रही होली।


पुरा’ बसन उतार दी
फुनगियाँ उगने लगीं
शोख हो गई, न भोली
धरा गा रही होली।


रस भरे अँग अंग अंगना
हरसाय सहला पवन सजना 
भर भर उछाह उठन ओढ़ी 
सजी धानी छींट चोली। 


शहर गाँव चौरा’ तिराहे
लोग बेशरम बाग बउराए
साजते लकड़ी की डोली 
हो फाग आग युगनद्ध होली ।