किरांती – 1

देश में घर हैं

घर में जन हैं, जननी हैं, जनावर हैं, जनखा हैं।

कुछ भी हो ये हमेशा हरखा हैं

इनकी बॉडी में फैट नहीं छ: आठ पैक हैं

झँकवाते फट फाट लाम दू नरखा हैं

कुछ भी हो ये हमेशा हरखा हैं।

 

नम्मर एक –

आँखों पर चश्मा, दाँतों पर कथ्था

पीक मारने को तीन दाँत ग़ायब गैप सथ्था

देश की चिंता में पैक निकल गाल पर

चेहरे का माल भर पेट तोंद ताल पर

ये हँसते हैं तो बजती है पिपिहरी

दूजे देह होती है फुरहरी

सुबह जाते हैं, शाम आते हैं

सनिच्चर अतवार को भठ्ठी और भठ्ठे पर पगुराते हैं

भठ्ठी पर पक्की है, कच्ची है

भठ्ठे पर खोलने को काली कँवल कच्छी है

इनकम है, काम है, जबर इनाम है

अधूरी सी जिन्दगी रहते उदास बड़े नाम हैं

अब तक न ओ मिली गरम तलाश है

उसके बिना तो जैसे देस देह लाश है

नंगों की बाढ़ से बड़े परेशान हैं

बिदक जायेगी वो, न आयेगी वो

बताते ‘किरांती’ उसका नाम हैं

न उदासी, न परेशानी सब सकाम हैं

ज्ञान है, ध्यान है, कोने वहाँ मसाले की दुकान है

थूक मार सच्ची – हम बड़े परेशान हैं

अद्धा गटक लूँ, किधर है भठ्ठी, किधर दुकान है?

किधर है किरांती, देश हैरान है।

हमहूँ मुक्तिबोध

हमहूँ मुक्ति 
हमहूँ बोध
हमहूँ मुक्तिबोध।
बोधुआ भी कर रहा
मुक्ति पर शोध
जो केहु टोके
करता है किरोध।
हमने कहा छोड़ आगे बढ़
का मुक्तिबोध के बाद कोई नहीं हुआ
उठाया जिसने अभिव्यक्ति का खतरा ?
उसने देखा
हमने जारी रखा अपना फेंका,
अगर ये सच है कि मुक्तिबोध के बाद
तुम्हें कोई नहीं दीखता
तो उनके ही शब्दों में
भारी भयानक सच है।
खतरनाक है।
हिन्दी क्या इतनी बाँझ है?
अगर कोई हुआ है
तो ये जन्मदिन पर क्या हुआँ हुआँ है?
कोई जरूरी है कि किसी को सिरफ
जन्मदिन पर ही याद करो?
फर्ज अदायगी करो
और फिर भूल जाओ अगले साल तक !
बोधुआ रे!
सही कहूँ तो हमको मार्क्सवाद अस्तित्त्ववाद वादबाद
कछु नहीं बुझात है
बुझात है सिरफ कि कामायनी की आलोचना
दूर की कौड़ी है
उनकी सभी लम्बी कविताएँ एक सी लगत हैं
तुम तो उन्हें सबसे बड़ा विचारक बनाए बैठे हो !
हमको तो विजय साही जियादा सही लगत हैं
एतना जो सुना
निकाला बोधुआ ने जूता ..
हमने पकड़ा उसका हाथ
समझाया
उन्हों ने गढ़ मठ तोड़ने की बात कही थी
है कि नहीं ?
उसने जूते की जुतारी भरी
खतरा टला जान हमने बात आगे करी
अब ये बताओ उनके नाम पर
तुम लोग काहे गढ़ मठ रचत हो ?
उसने बकास सा हमरी ओर देखा
हम खुश हुए अपनी झकास पर।
बात आगे बढ़ाई
देखो आँख खोल देखो
पाँच रुपए घंटा माँ
और एकाध सौ घंटा माँ
तुम नेट से जान जाओगे
कि दुनिया बहुते आगे जा चुकी है।
कि गढ़ मठ कुआँ बना
चेहरे पर मुर्दनी सजा
छापो तिलक लगा
राम राम मुक्ति मुक्ति जपत हैं।
हिन्दी मइया तकत हैं
हमका बोध कब होयगा
जे हाल है उस पर किरोध कब होयगा?
रुकी ग्रामोफोन की सुई
डीजे वीजे के जमाने में
मुक्तिबोध के सहारे लगे नौकरी हथियाने में ।
प्यार करो आदर करो
लेकिन उनके घेरे से बाहर चलो
हिन्दी अबहूँ दलिद्दर है
शोध के लिए कछु और चुनो
भूल गए क्या?
“ … मेरे युवकों में होता जाता व्यक्तित्वान्तर,
विभिन्न क्षेत्रों में कई तरह से करते हैं संगर,
मानो कि ज्वालापँखरियों से घिरे हुए वे सब
अग्नि के शतदलकोष में बैठे !!
द्रुतवेग बहती हैं शक्तियाँ निश्चयी।“
बोधुआ ने हमरी ओर देखा
जूते को फेंका
चल दिया बड़बड़ाता,
”पागलों के मुँह क्या लगना ?
जूते मार कर भी क्या होगा?”
मैं गली में आगे चल दिया
एक और बोधुआ की तलाश में …