प्रेम

कुछ यूँ दीवाने हैं वो मुझ पर
कहता हूँ आधा वे ढाई कर देते हैं।

प्रेम शायद इसे ही कहते हैं।

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आज की रात तुम्हें फिर पाना चाहता हूँ।

होठों की नमी के पीछे
दहकती पास प्यास
रेख रेख देख सकता हूँ
छू नहीं सकता – होठ सूखते हैं।

इतने निकट होना कि
साँसें दूर धकेलने लगें
और आँखें जीभ को सोख लें
कह नहीं सकता – होठ फटते हैं।

हवाओं को सहलाता हूँ
अंगुलियों से सुलझाता हूँ
चमकते चन्द रजत गुच्छे
बह नहीं सकता – आँसू रुकते हैं।

बुनता हूँ धागे जो अदृश्य हैं
कि पहना दूँ दिगम्बर तन को
जलती चाँदनी जलन से रूप पर
सह नहीं सकता – भाव बिंधते हैं।

न, वहीं रहो, दूरियाँ सुन्दर हैं
आज की रात बस सुन्दर है
निशा सहमेगी, भटकेगी यामिनी,
पर्याय हो रजनी करेगी राहजनी
कोई चिंता नहीं, दुख नहीं, सुख नहीं
लुटने लुटाने का भय नहीं
इतनी उठान कि उड़ना चाहता हूँ
इतनी थकान कि मरना चाहता हूँ।
आज की रात मैं बच्चे सा सोना चाहता हूँ

कुछ नहीं, खोया कभी नहीं
आज की रात तुम्हें फिर पाना चाहता हूँ। 

तुम्हारे बिना अब तो और नासमझ हूँ।

परिवारी नैन झरोखे
करते रह गये निगरानी।
किंवाड़ चौखट झरोखे
झाँकते दो नैन झरोखे 
प्रेम छ्ल उतरा 
अधर दबा दाँतों से। 
अंगुलियाँ हुईं मेरी घायल
किंवाड़ चौखट बीच पिस,
और चीख निकली तुम्हारी।

होती रही निगरानी
बात करती रही सयानी 
लेकर मेरा कर अपने कर 
होठों की फूँक में
लेकर मेरी सिसकारी
बच्चे हो क्या? 
वहाँ ऐसे हाथ रखते हैं भला? 
बहुत पिरा रही है? 
बुद्धू! कुछ नहीं समझते।
… 
हाँ, मुझे पीर की समझ नहीं 
तुम्हारे बिना अब तो और नासमझ हूँ।           

मीत रचो गीत आज

मीत रचो गीत आज, देहों के सजे साज, छुअन अंग बदन काम, मीत रचो गीत आज। 
संयम न ध्यान याम, आदिम हैं राग साम, सहज शब्द नि:शब्द धाम, सूझे भला गीत गान? 
साँसो के तार धार, चुम्बन अधर बार बार, गन्ध मिलन दो विराम, मीत रचो गीत आज। 
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बस यूँ ही बुद्धू बने रहना

वंचना जग की प्रवृत्ति,
घोर अनास्था पैठ रही। 

सच का है कड़वा स्वाद, तड़का तराशें और परोसें 
झूठ गली का सोंधा माल, चटकारे ले सभी भकोसें। 
किंशुक फूले, फूले गुलमोहर, छतनार हुई गाछों की डालें 
चक्र सनातन घूमे अविरत, कौन घड़ी हम बन्धन बाँधें? 

श्लथ छ्न्द अनुशासन, गण अगणित, टूटें क्षण क्षण। 
रह रह समेटना, गिरना,रह रह उठना।
नहीं, तुम्हारा प्रिय नहीं पराजित।
ढूँढ़ता है इस मौसम 
होठों पर खिलते हरसिंगार 
सरल अंत:पुर शृंगार 
भाषित सुगन्ध सदाचार
प्रेमिल वाणी निश्छल 
मौन सामने साँसें प्रगल्भ –  
“ऐसे ही रहना बुद्धू! 
मर कर होते विलीन 
सब भूत लीन  
नश्वरता संहार 
अन्याय अत्याचार 
सब सही। 
सोचो तो 
तुम कहाँ पाते ठाँव 
जो मैं न होती?
सोचो तो 
कौन करता आराधन 
इस भोली अनुरागिनी का 
जो तुम न होते?”  
– क्या यह बस मुग्ध प्रलाप?- 
“नहीं, यह है विस्मृति 
जिसे तुम कहते स्मृति।
भूले जीवन श्वेत श्याम 
द्वन्द्व प्राण का पहला नाम। 
देखो! मैं बिखरी अब ओर 
देखो! तुम बिखरे सब ओर  
टूटे क्षण नहीं, मुझे समेटो 
हरसिंगार हैं हर पल झरते
कुचल गये जो, निज को समेटो।
क्या समझाना? 
अब तो मैं हुई बड़ी 
क्या समझना? 
अब तो तुम हुये बड़े?
विस्मृति ही सही 
बस यूँ ही स्मृति में लाते रहना।
स्मृति ही सही 
बस यूँ ही बुद्धू बने रहना।”

कहीं से शुरू करूँ, वो तुम तक पहुँच जाती है

सर्च के ‘फरमान’ में जोड़ देना ‘तुगलकी’
ईश्वर तब भी मिलेगा – कुछ अधिक ही। 
वह योगी अब नहीं रहा जो गाया करता था 
“मोको कहाँ ढूँढ़े रे बन्दे! मैं तो तेरे पास में”।
बहुत कष्ट होता है तुम्हें बैन करते हुये यार!
तुम अब ठीक से पढ़ते नहीं या मैं ठीक लिखता नहीं। 
बहुत दिनों से पैक रखा है दीवान में बन्द गिटार
बच्चा अब बिना संगीत के ही झूम लेता है।  
नर्म गर्मी मेरी पीठ पर अब सवार होती नहीं 
हाथों पर अब जुल्फों के फेरे न अश्कों के घेरे।
रिपेयर में गया था कविताओं भरा लैप टॉप 
कमबख्तों ने कीबोर्ड ही बदल दिया।

चुम्बन में अधर अब बहकते नहीं, न ढूँढ़ते हैं 
दरकार जिसकी थी वह चाहत मिली भी नहीं
यह बात और है कि साँसें धौंकनी हो चली हैं 
सलवटें नहीं रहीं सदानीरा, पठारी नदी हो गई हैं।
कहते हैं जवानी चाँदनी सी मद्धम होती जाती है
ठहराव आता है, जिन्दगानी उलझती जाती है 
क्या करूँ, जब भी करता हूँ समझदारी की बात
कहीं से शुरू करूँ, वो तुम तक पहुँच जाती है।    

कच्च, कच्च?…हाँ जी, सच्च सच्च।

बच्चे गये स्कूल 
और घर में रह गये 
मैं, तुम और 
छ: घड़ियों की कच्च…कच्च… 
घड़ियाँ तेज नहीं भागतीं 
चाहे जितनी घड़ियाँ लगा लो। 
समय की अपनी मर्यादा है।

इतने वर्षों में एक बदलाव हुआ है
चाभी वाली घड़ी डायनासोर हो गई  
लिहाजा एक सेकेंड में 
तीन बार की टिक टिक तेज रफ्तारी भी गई। 
अब डिजिटल का जमाना – 
एक बार में एक सेकेंड – कच्च!
नो टिक टिक भागमभाग। 
पर 
जिन्दगी भागमभाग 
तेज रफ्तार हो गई तीन गुनी। 

तो ऐसे कंफ्यूजन में 
जब कि तनहाई है 
और ऑफिस जाने में अभी टाइम है – 
क्यों न कुछ कच्च कच्च चुरा कर रख लें? 
इस खतरे को उठा कर भी 
कि दाल जल जायेगी
या दूध फफा जायेगा … 

ये सजोई गई चोरियाँ 
बहुत काम आयेंगी 
तब जब बच्चे अपने अपने घर की 
कचकच ..उफ! .. कच्च कच्च में बीजी होंगे 
और डिजिटल घड़ियों में समय ठहर जायेगा।

बैटरी बदलने को भी किसी को बुलाना होगा 
वह जब तक नहीं आयेगा 
समय होगा हमारा ग़ुलाम। 
उस ठहरे दौर में चोरी की पोटली खोलेंगे 
तुम एक कच्च को लपक कर हँसना 
और मैं दूसरे को सहलाते 
आज की जली दाल याद करूँगा- 
दो बच्चों की ठिठोली।

इस चोरी में एक स्वार्थ भी है – 
जली कटी को बचाने का। 
पोटली के खिलवाड़ में 
जली कटी न कही जायेगी 
और न सुनी जायेगी। 
वह रह जायेगी 
हमारी रूहों में 
सुरक्षित। 
और हम 
इश्क़ के माइक्रोओवन में 
पकी खिचड़ी खा कर जीते जायेंगे – 
जलने का कोई डर नहीं। 

मैं जानता हूँ 
तुम हँसोगी और पूछोगी –  
रूह की जली कटी का क्या करेंगे?
उत्तर यह है प्रिये! 
कि 
मरने के बाद 
ईश्वर का करने को हिसाब 
ये जली कटी काम आयेंगी। 
वह लजायेगा 
और 
उन्हें ले कर रख लेगा अपने पास। 
अगले जन्म में 
यानि कि 
सात जन्मों के अगले चक्र में 
हमारी आत्मायें हल्की होंगी 
और अधिक स्वस्थ होंगी। 
अब यह न पूछ्ना 
कि 
अगर यह जन्म सातवाँ हुआ तो?      

देखो! दाल जलने की गन्ध भी आने लगी 
अब वैसे आँख झपकाना छोड़ो 
जब शुरू के दिनों में मैं करता था 
प्यार की बातें और तुम बस झप्प! झप्प!! 
कुछ कच्च कच्च सहेज लें – 
सच्च? 
हाँ जी, 
सच्च!