पुरानी डायरी से – 18: अधूरी कविता

रजनी का पक्ष कृष्ण
बेला है भोर की ।
चंचल मन्द अनिल नहीं ऊष्ण
कमी है शोर की।


अपूर्ण चाँद ऐसा लगता
अन्धकार को दूर करने हेतु
जैसे जला दिया हो प्रकृति ने
एक शांत दिया।


श्वेत बादल ऐसे चलते
इस दीप के उपर से
जैसे हों इस दीप से निकले
पटलित धूम।


इक्के दुक्के तारे निकलते
इनके बीच से
जैसे खेल रहे हों बच्चे
आँखमिचौनी गरीब के।

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पुरानी डायरी से – एक अंग्रेजी कविता और अनुवाद, I shall die

09032010 And a day when I shall die
My lyrics, my poems, my songs
Will also die with me.
A dead never utters –
I shall die.

Queen of the earth !
Your frozen lips shall touch my limbs
Slowly and very slowly
My spirit shall vanish
Like a piece of Camphoor
And I shall die.

In the murmur of leaves
In the striding steps of winds
In the tender shower and breeze
My breath shall linger and wait
But I shall die in solitude-
I shall die. 

और एक दिन जब मैं मर जाऊँगा
मेरे गीत, मेरी कविताएँ, मेरे गान
मेरे साथ मर जाएँगे
मृतक कभी नहीं बोलता –
मैं मर जाऊँगा।

धरा की रानी !
तुम्हारे हिम-अधर
करेंगे स्पर्श मेरे अंगों का
धीरे और बहुत धीरे
मेरी चेतना लुप्त होगी
कपूर के टुकड़े सी –
और मैं मर जाऊँगा।

पत्तियों की मर्मर में
पवनों के तेज कदमों में
मृदु वर्षा बूदों और झँकोरों में
रह जाएँगी मेरी साँसे प्रतीक्षित – 
लेकिन मैं मर जाऊँगा एकांत में
मैं मर जाऊँगा।

पुरानी डायरी से – 14: मस्ती के बोल अबोल ही रह गए

फाग महोत्सव में अब तक:
(1) बसन तन पियर सजल हर छन
(2) आचारज जी
(3) युगनद्ध-3: आ रही होली
(4) जोगीरा सरssरsर – 1
आज पुरानी डायरी उठाया – यह देखने के लिए कि फाग से सम्बन्धित कुछ मिल जाय। निराश हो ही रहा था कि एक टुकड़ा नीचे गिरा, देखा, आस बँधी, पढ़ा और फिर … कुछ मिला था लेकिन शिकायत भरा। कागज का वह टुकड़ा फाड़ कर अलग से डायरी में रखा था। देखने से लगता है कि दूसरी डायरी का अंश है। उस पर 12 मार्च दिन सोमवार अंकित है। समय सन्दर्भ के लिए पलटा तो अनुमान लगाया कि बात 1993 की होनी चाहिए (ज्योतिषी लोग ही बता पाएँगे कि ऐसे दिन होली कब पड़ी होगी, ये बात तो पक्की बता सकते हैं :))। एक सम्भावना यह भी है कि उस संवत में मैंने पुरानी डायरी बस दिनांक मिलाते हुए प्रयोग किया होगा। मध्यमवर्गी युवक उपहार में मिली डायरियों को ऐसे उपयोग में लाते रहे हैं। अस्तु..
अपनी तमाम डायरियाँ मैंने नष्ट कर दीं लेकिन इस टुकड़े को उस समय भी बचा लिया था।.. शिकायत पर हँसी आई। आदमी का मन भी अजीब होता है – जैसा खुद रहता है, आस पास भी वैसा ही ढूँढ़ लेता है। सुना है कि मिस्री पिरामिडों के शिलालेखों में भी ऐसी बाते पाई गई हैं जो कहती हैं कि ज़माना दिन ब दिन खराब होता जा रहा है। युवक उच्छृंखल होते जा रहे हैं... वगैरा वगैरा। 
..नष्ट की जा चुकी उस डायरी के इस बचे अंश में गाँव की होली के बारे में यह लिखा है:
06022010होली। उत्साह और प्राकृतिक ग्रामीण ढंग का आनन्द दिनों दिन कम होता जा रहा है।
उसके बाद दूसरे रंग की पेन से यह कविता है जिसमें पेंसिल से किए संशोधन भी दिखते हैं। साझा कर रहा हूँ:
ढोलक की थाप गई चउताल की ताल के गीत सारे बह गए।
रंगों की ठाठ गई, भाभियों के बोल अजाने जाने क्या कह गए।
बदल गए लोग बाग, बदली बयार अब, मीत सारे मर गए।
कचड़ा अबीर भया, भंग के रंग गए, मस्ती के बोल अबोल ही रह गए।
जाने क्यों आशंका सी उठ रही है – इस बार कहीं हिन्दी ब्लॉगरी की होली भी ऐसी न हो जाय ! … धुत्त जोगीरा ।

पुरानी डायरी से -12 : श्रद्धा के लिए

13 दिसम्बर 1993, समय:__________                                 श्रद्धा के लिए


तुम्हारा बदन 

स्फटिक के अक्षरों में लिखी ऋचा  
प्रात की किरणों से आप्लावित
तुम्हारा बदन।


दु:ख यही है 
मेरे दृष्टिपथ में 
अभी तक तुम नहीं आई।
कहीं  ऐसा तो नहीं 
कि तुम हो ही नहीं !
नहीं . . . . 

पर मेरी कल्पना तो है – 
“तुम्हारा बदन 

स्फटिक के अक्षरों में लिखी ऋचा
प्रात की किरणों से आप्लावित
तुम्हारा बदन।”


पुरानी डायरी से – 10: कल्पना के लिए

6 फरवरी 1994, समय:__________                                               कल्पना के लिए  

कभी कभी मैं सोचता हूँ माधवी – 
मैं रहूँ, मेरा शून्य हो और तुम रहो।
मोमबत्ती का अँधेरा हो/ उजाला हो
हम तुम बातें करें – शब्दहीन
तुम्हारे अधर मेरे अधरों से बोलें
मेरे अधर तुम्हारे अधरों से बोलें
शब्दहीन।
कभी कभी मैं सोचता हूँ माधवी।


प्रात:काल में जब
सूर्य की किरणों से भयमुक्त
तुहिन बिन्दु सहलाते हों पत्तियों को ।
निशा जागरण के पलों से मुक्त होकर
मैं तुम्हें देखता रहूँ
अपलक
अविराम। 
कभी कभी मैं सोचता हूँ माधवी।


दुपहर की चहल पहल में
किसी बाग के सनसनाते सन्नाटे में
मेरे श्वास नहा रहे हों 
तुम्हारी तप्त साँसों की शीतलता में
और
घुल रहे हों हमारे एकाकी क्षणों में
किसी अनसुने गीत के बोल।
कभी कभी मैं सोचता हूँ माधवी।


संध्या के करियाते उजाले में जब
दीप जलायें या न जलायें
इस असमंजस में हो गृहिणी ।
उस समय हमारा मिलन  छलकता हो 
डूबते सूरज की लाली में।
हमारे बोल गूँजते हों चहचहाहट में।


कभी कभी मैं सोचता हूँ माधवी।
मैं रहूँ मेरा शून्य हो और तुम रहो
कभी कभी मैं सोचता हूँ। 

पुरानी डायरी से – 8: गीताञ्जलि के लिए

_________, समय:__________                                                         गीताञ्जलि के लिए                                                   


प्रिय!

कल खड़ी थी तुम्हारे द्वार
रीतियों के वस्त्र पहने
परम्परा का कर श्रृंगार
तूने कपाट नहीं खोले
लौट गई मैं निराश –


आज फिर खड़ी द्वार
प्राकृतिक
वस्त्र हीना ।
बस कुंकुम अंकित भाल
प्रिय द्वार खोलो न –


नग्नता का अभिसार
कितना सुन्दर !


पहना दो आलिंगन वस्त्र
कर दो स्पर्श श्रृंगार
भर रोम रोम मादक रस धार।


प्रिय!
द्वार खोलो 
देखो
नग्नता कितनी सुन्दर है !



पुरानी डायरी से – 2

…. अपनी पुरानी डायरी आप के सामने खोलना प्रारम्भ कर रहा हूँ – पन्ने दर पन्ने , बेतरतीब । डायरी रोजनामचा टाइप नहीं बल्कि सँभाल कर छिपा कर किए प्रेम की तरह – जब मन आया लिख दिए, जब मन आया चूमने चल दिए, बहाने चाहे जो बनाने पड़ें। 
नई जवानी में बचपना अभी शेष है लेकिन आश सी है कि इन पन्नों को भी उतना ही प्यार दुलार मिलेगा।
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इसके पहले पुरानी डायरी से – 1


6 अप्रैल 1993, समय: रात्रि 1110                                ‘नश्वर’

हाँ यह शरीर नश्वर !
पूजित पहचान अमर
हाँ यह शरीर नश्वर।


स्वागत तिरस्कार
सौन्दर्य अभिसार
जीवंत काम अध्वर
हाँ यह शरीर नश्वर।


नीड़ का निर्माण
वेदना निर्वाण
उद्घोष प्राण सस्वर
हाँ यह शरीर नश्वर।