पुरानी डायरी से -11 : … मैं बूढ़ा हो गया …

22 मई 1992, समय:__________                                                          …. मैं बूढ़ा हो गया …

सुबह सुबह आज 
दाढ़ी बना रहा था।
थोड़ा सा एकांत देख
बीवी ने कहा
सुनते हो, बिटिया सयानी हो गई है
कहीं बातचीत तो करो ! 


उसी पल 
शीशे में कनपटी के बाल सफेद हो गए।
चेहरे की झुर्रियाँ उभर कर चिढ़ाने लगी मुँह । 
आँखें धुँधली हो गईं।
उसी पल
मैं बूढ़ा हो गया।
… मेरे भीतर कुछ टूट गया। 

पुरानी डायरी से – 9: शीर्षकहीन

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आज डायरी खँगालते यह कविता दिखी – विरोधाभास  उलटबाँसी सी लिए। तेवर और लिखावट से लगा कि अपेक्षाकृत नई है।
कब रचा याद नहीं आ रहा। सन्दर्भ /प्रसंग भी नहीं याद आ रहे। चूँ कि पुरानी डायरी का सम कविताएँ और कवि भी . . पर 
पूरा हो चुका था इसलिए यहाँ विषम प्रस्तुति करनी ही थी, सो कर रहा हूँ। एक संशोधन भी किया है।
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अधिकार ही नहीं यह कर्तव्य भी है 
कि ऊँचाइयों में रहने वाले  
दूसरों नीचों के आँगन में झाँकें।

ऊँचाइयाँ तभी बढ़ेंगी
और झाँकने की जरूरत समाप्त होगी।


पर कोई झाँकता नहीं।
ऊँचाई पर रहने वाला
एयरकण्डीसंड फ्लैट में बन्द है।


पुरुवा के झोंके भी तो
मशीन से आते हैं।


ऊँचाई कैसे खत्म होगी ? 

पुरानी डायरी से – 7 : तलाश

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इस कविता पर कोई समय चिह्न न होना इसे सन्दिग्ध बनाता है। 
यह उस समय की लगती है जब बेवकूफी भरे प्रेम से मोहभंग हो गया था।
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_________, ____________                                                                                             तलाश 

तुम पास आती हो तो मैं डर जाता हूँ
कहीं मेरी तनहाइयाँ तुम्हारे वज़ूद को सोख न लें !


मैं जानता हूँ 
तुम अभी कहोगी
“कुछ सुनाओ।”
जो कुछ मैं तुम्हें सुनाता रहा आज तक
वह सब कुछ मेरा नहीं था
मेरे शब्दों में दूसरे लोग बोल रहे थे – 
तुम्हें शायद पता न हो 
मैं तो अभी भी ढूँढ़ रहा हूँ उसे
जिसे ‘अपनी कविताएँ’ सुना सकूँ।

(कल चुपके से एक सरसराहट हुई मस्तिष्क में
तुम्हारी कविताएँ सिर्फ तुम्हारे लिए हैं-
कमरा बन्द कर लो
और जोर जोर से अपनी कविताएँ पढ़ो
जब तक उनके शब्दों का शून्य 
भर न दे पूरे कमरे को
और विवश न कर दे तुम्हें
चिल्लाते हुए बाहर आने को।) – शायद ये पंक्तियाँ भी दूसरे की हैं।


मैं जानता हूँ – अभी तुम ऐसा कहोगी
“कमाल है कि इतने बड़े संसार में
आज तक कोई नहीं मिला तुम्हें 
जिसे तुम अपनी सुना सको?”


मैं भयभीत हूँ 
अपने ही शब्दों से –
वे बिखरे शब्द
मेरे वाक्यों में बिंध कर
(बँध कर नहीं)
कितने शक्तिशाली हो गए हैं !


मैं पराजित हूँ उनके आगे
कभी कभी मैं भ्रमित हो उठता हूँ
कहीं ऐसा तो नहीं कि ….
छोड़ो 
मगर आज के बाद फिर मत कहना
“कुछ सुनाओ”
‘दूसरों की’ ‘दूसरों को’ सुनाते-सुनाते
मैं खुद दूसरा हो गया हूँ –
मुझे अपने आप को तलाशना है
अपनी ही कविताओं में।


तब तक ‘फरमाइश’ न करना
कुछ मत कहना 
जब तक कि यह तलाश पूरी न हो जाय।

पुरानी डायरी से – 5 : धूप बहुत तेज है।

07 जून 1990, समय: नहीं लिखा                                                     

                                                                                                                               ‘धूप बहुत तेज है’


इस लाल लपलपाती दुपहरी में
काले करियाए तारकोल की नुकीली
धाँय धाँय करती सड़कों पर
नंगे पाँव मत निकला करो
क्यों कि
धूप बहुत तेज है।


लहू के पसीने से नहा कर  
तेरी शरीर जल जाएगी इन सड़कों पर ।
लद गए वो दिन
जब इन सड़कों की चिकनाई
देती थी प्यार की गरमाई।
बादलों की छाँव से
सूरज बहुत दूर था।
मस्त पुरवाई के गुदाज हाथ
सहला देते थे तेरे बदन को ।


आज सब कुछ लापता है
क्यों कि 
धूप बहुत तेज है।


सुबह के दहकते उजाले में
तीखी तड़तड़ाती आँधी                                      (मुझे याद आ रहा है कि ये पंक्तियाँ किसी दूसरे की कविता से ली गई थीं)
भर देती है आँखों में मिर्च सी जलन।
छटपटाता आदमी जूझता है अपने आप से।
काट खाने को दौड़ता है अपने ही जैसे आदमी को। 


नहीं जानता है वह
या जानते हुए झुठलाता है
कि
सारा दोष इस कातिल धूप का है।


निकल पड़ो तुम 
इस धूप के घेरे से।
क्यों कि यह धूप !
नादानी है
नासमझी है।
क्यों कि
तेरे मन के उफनते हहरते सागर के लिए
यह धूप बहुत तेज है।
धूप बहुत तेज है।

पुरानी डायरी से – 3 : घिर गई काली उदासी


23 अप्रैल 1993, समय: अपराह्न 03:00                                                     

‘घिर गई काली उदासी’


नींद से स्वप्न तोड़े, घिर गई काली उदासी
ठूँठा वन, सूना मन, बह गई पछुवा हवा सी। 


तुम किसी लायक न थी, हाय मेरी चाहना 
छोटी छड़ी हाथों लगी, था समुद्र थाहना
चन्द्रिका की वासना, चन्द्र को आँखें पियासी
घिर गई काली उदासी।


रंग रूप रस गन्ध माधुरी, क्यों न भोगे ? 
संग अंग छवि बन्ध नागरी, क्यों न भोगे ?
पतझड़ फिरता नहीं, क्यों नहीं समझा विनाशी?
घिर गई काली उदासी। 

पुरानी डायरी से – 1

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नया जवान होता व्यक्ति अभिव्यक्ति के सागर जेब में लिए चलता है। जेब भी कैसी ! पानी तक न टपके। जब जरूरत हो तो निचोड़ कर ऐसी टपकाए कि बस ….
थोड़ा रूमानी और ताक झाँक वाला स्वभाव हो तो क्या कहने ! 
आज अपनी पुरानी डायरी आप के सामने खोलना प्रारम्भ कर रहा हूँ – पन्ने दर पन्ने , बेतरतीब । डायरी रोजनामचा टाइप नहीं बल्कि सँभाल कर छिपा कर किए प्रेम की तरह – जब मन आया लिख दिए, जब मन आया चूमने चल दिए, बहाने चाहे जो बनाने पड़ें। 
नई जवानी में बचपना अभी शेष है लेकिन आश सी है कि इन पन्नों को भी उतना ही प्यार दुलार मिलेगा।
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9 मई 1992                          ‘झुलसा सारा गाँव’

आज चाँदनी के आगन में, गरमी धरती पाँव
झुलस गए सब फूल पतंगे, झुलसा सारा गाँव।


सूख गए सब ताल तलइया
कोयल छोड़ चली अमरइया
गिद्धों के उन्मुक्त भोज में
कउवे बोलें काँव
झुलसा सारा गाँव।


भाग चले सब छोड़ घोंसले
मन में जलता काठ कोप ले
भाग दौड़ छीना झपटी में
सधते सबके पाँव
झुलसा सारा गाँव।


दीप दिवाली होली गाली
खा गइ सभी अमीरी (?) साली
नए ठाँव के नए ठाठ में
चलती कागज की नाँव
झुलसा सारा गाँव।  
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