री !

सुरसरि तट
सर सर लहर सुघर सुन्दर लहर कल कल टल मल सँवर चल कलरव रव री !
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हिन्दी कविता के प्रयोगवादी दौर में एक वर्ग ऐसा भी रहा जो छ्पे हुए शब्दों को भी एक तार्किक समूह में कागज पर रख देने का हिमायती था ताकि कविता की लय (अर्थ और विचार दोनों) छपाई तक में दिखे। उतना तो नहीं लेकिन सुधी जन की टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए यति की दृष्टि से पंक्तियों में तोड़ दें तो कविता यूँ दिखेगी:
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सुरसरि तट

सर सर लहर सुघर सुन्दर
लहर कल कल टल मल
सँवर चल
कलरव
रव री !




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