चन्द पंक्तियाँ

प्रीत की रंगत मेंहदी के निखार में नहीं

उमंग देखो, जिसके कारण लगाई जाती है।

हैं लब चुप और वो भीतर घुमड़ते रहते हैं

नाकाफी सादे हर्फ हैं, बेवजह सजाई पाती है।

हरदम तुम्हें वजहें मिलें कोई जरूरी नहीं

ढूँढ़ते जिन्हें दरबदर, ग़ैरों के दर पाई जाती है।

रोज बाँचते हैं अफसाने मन के शफेखाने में

कहें कभी जो, हकीक-ए-मश्वरा निभाई जाती है।    

  

 

तिलस्मी बहुत हैं रंगों के उजाले

कुछ नहीं बदला पिछले एक वर्ष में। कुछ काट छाँट और एक जोड़ के साथ दुबारा प्रस्तुत:  


 जिस दिन खादी कलफ धुलती है।
सजती है लॉंड्री बेवजह खुलती है।

ये अक्षर हैं जिनमें सफाई नहीं
आँखों में किरकिर नज़र फुँकती है।

गाहे बगाहे जो हम गला फाड़ते हैं,
चीखों से साँकल चटक खुलती है।

रसूख के पहिए जालिम जोर जानी,
जब चलती है गाड़ी डगर खुदती है।

आईन है बुलन्द और छाई है मन्दी,
महफिल-ए-वाहवाही ग़जब सजती है।

साठ वर्षों से पाले भरम हैं गाफिल,
जो गाली भी हमको बहर लगती है।

सय्याद घूमें पाए तमगे सजाए
आज बकरे की माँ कहर दिखती है।

पथराई जहीनी हर हर्फ खूब जाँचे,
ग़ुमशुदा तलाश हर कदम रुकती है।

खूब बाँधी हाकिम ने आँखों पे पट्टी,
बाँच लेते हैं अर्जी कलम रुकती है।


तिलस्मी बहुत हैं रंगों के उजाले 
नीले चक्के के आगे नज़र चुँधती है। 

नहीं होती

यूँ बेतहाशा भागने से कवायद नहीं होती 
रोज घूँट घूँट पीने से तरावट नहीं होती।

चुप रहते जब कहते हो क्या खूब कहते हो 
लब हिलते हैं, आवाज सी रवायत नहीं होती।

ज़ुदा हुआ ही क्यों कमबख्त हमारा इश्क़ 
आह भरते हैं हम और शिकायत नहीं होती।

रीझते हो रूठने पर, मनाना भूल जाते हो 
यूँ मान जाते हम तो ये अदावत नहीं होती।

अदावत ऐसी कि बस तेरा नाम लिए जाते हैं 
दुनिया में ऐसे इश्क पर कहावत नहीं होती।  

लाइट ले यार!

ये कैसा इश्क है तेरा दिलवर?
जहाँ छूते हो वहीं दुखता है। 

दूसरा वर्जन: 

ये कैसा इश्क है तेरा दिलवर?
वहीं छूते हो जहाँ दुखता है।

न दो

घिर आई बदलियाँ कोई नाम न दो 
स्याह शाम दिये को इलज़ाम न दो


तमाम शहर रोशन गलियों में आब
बेनूर से चेहरे कोई पहचान न दो


ठंडक से परेशाँ घर घर की गर्मी    
बिस्तर बेसलवट वस्ल नाम न दो


बच्चों की रवायत जो खेले खामोश 
ग़ुम खिलखिल को कोई पयाम न दो  

है तासीर इनकी उलूली जुलूली
मेरे गीतों को बहरों की तान न दो