किस काम की ये गदराई ?

नीले बितान पर 
बदरी है छाई 
दई के मुँह पोत रही 
कालिख करुवाई । 
तरबतर पसीने 
जोत रही
खेतों में 
सूखी कमाई 
बूढ़ी है माई।  

पास के शहर में, टिन के शेड में 
परेशाँ लहना* है 
छा पाए कैसे, 
छ्प्पर जो महँगा है  
ग़जब उमस है भाई ! 
रोटी की भाप
हाथ आग है लगाई 
बड़ी  गरुई महँगाई। 

चूल्हे को झोंक झौंक, 
बालों को रोक टोक 
सिसके मैना है 
अम्मा की बात पर 
देवर की तान पर 
माखे नैना हैं 
न टूटे सगाई ! 
बाबा ने बियह दिया 
कसाई संग गाई ।  

छोड़ो बदरी शर्मी 
निकल नाचो बेशर्मी 
जो झड़ पड़े 
बरस पड़े
झमाझम चउवाई।
हुलसे खेतों में माई 
भागे लहना से महँगाई 
मिटे मैना की करुवाई 
घोहा घोहा मूँठ मूँठ 
झरे छर छर कमाई 

अब बरसो भी,
किस काम की ये गदराई ?

* लहना – वृद्धा के बेटे का नाम 
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नजर पिचकारी

फेर दो रे साजन नजर पिचकारी
न समझो मैं कारी
चढ़ जाएगी सारी नजर पिचकारी।

दाल में नमक ननदिया छिनारी
बिष बढ़ाई बाति महतारी पे डारी
न समझो मैं कारी।

मटकी थी भारी दही छलकी अनारी
सासु गारी दिहिन न सहाया मैं नारी
न समझो मैं कारी।

मेह ढलका नहीं मोरि अँखियाँ सकारी
जोत इनमें बसी तोरी नेहिया सँभारी
न समझो मैं कारी।

फेर दो न साजन नजर पिचकारी
चढ़ जाएगी सारी नजर पिचकारी। 

देहात – साँझ, रात, भिनसार

साँझ
नहीं ठाँव
तारों के पाँव।


पीपल
पल पल
जुगनू द्ल।


गीत
सुने माय
मुँह बाय।


पावर
रोशनी कट
ढेबरी सरपट।


चाँद
फेंक प्रकाश
लानटेन भँड़ास।


मच्छर
गुमधुम
लोग सुमसुम।


श्वान
संभोग दल
रव बल छल।


फूल
पौधों के शूल
रजनी दुकूल।




ओस
रही कोस
बारिश भरोस।


….
….
बयार
हरसिंगार
धरती छतनार।

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ये हिमांशु जी की टोकारी पर:

सेंक
रोटी फेंक
चूल्हा टेक।
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