पुरानी डायरी से – 8: गीताञ्जलि के लिए

_________, समय:__________                                                         गीताञ्जलि के लिए                                                   


प्रिय!

कल खड़ी थी तुम्हारे द्वार
रीतियों के वस्त्र पहने
परम्परा का कर श्रृंगार
तूने कपाट नहीं खोले
लौट गई मैं निराश –


आज फिर खड़ी द्वार
प्राकृतिक
वस्त्र हीना ।
बस कुंकुम अंकित भाल
प्रिय द्वार खोलो न –


नग्नता का अभिसार
कितना सुन्दर !


पहना दो आलिंगन वस्त्र
कर दो स्पर्श श्रृंगार
भर रोम रोम मादक रस धार।


प्रिय!
द्वार खोलो 
देखो
नग्नता कितनी सुन्दर है !



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