आत्मनिवेदन

हेतु सिरजन नत मन
दया करो जीवन धन।

टूट गये वीणा के तार
खर गईं लिपियाँ पार
हार हृदय सकल भार
अब सँभार जीवन धन।

छ्न्द निबन्ध हीन प्राण
दिवा रात भर सकल तान
मौन भरमे नमन गान
असुर तान जीवन धन।

छोड़ गये सब राह मीत
पाथ साध भर भाव गीत
बची रहेगी सदा प्रीत
जाग रीत जीवन धन।

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उदास द्विपदियाँ -26 जनवरी पर

जिस दिन खादी कलफ धुलती है।
सजती है लॉंड्री बेवजह खुलती है।

फुनगियों को यूँ तरस से न देखो,
उन पर चिड़िया चहक फुदकती है।

बहुत है गुमाँ तेरी यारी पर दोस्त,
सहमता हूँ जो तुम्हारी नज़र झुकती है।

ये अक्षर हैं जिनमें सफाई नहीं
आँखों में किरकिर नज़र फुँकती है।

गाहे बगाहे जो हम गला फाड़ते हैं,
चीखों से साँकल चटक खुलती है।

रसूख के पहिए जालिम जोर जानी,
जब चलती है गाड़ी डगर खुदती है।

आईन है बुलन्द और छाई है मन्दी,
महफिल-ए-वाहवाही ग़जब सजती है।

साठ वर्षों से पाले भरम हैं गाफिल,
जो गाली भी हमको बहर लगती है।

सय्याद घूमें पाए तमगे सजाए
आज बकरे की माँ कहर दिखती है।

पथराई जहीनी हर हर्फ खूब जाँचे,
ग़ुमशुदा तलाश हर कदम रुकती है।

खूब बाँधी हाकिम ने आँखों पे पट्टी,
बाँच लेते हैं अर्जी कलम रुकती है।

तुम्हारी कविताई

पारदर्शी पात्र
सान्द्र घोल।
तुमने डाल दी 
एक स्याही की टिकिया
धीरे से।
रंग की उठान
धीरे धीरे 
ले रही आकार।

जैसे समिधा 
निर्धूम प्रज्वलित,
समय विलम्बित
बँट गया फ्रेम दर फ्रेम।
..कि 
आखिरी आहुति सी
खुल गई
अभिव्यक्ति एकदम से !

तुम्हारी कविता
बना गई मुझे द्रष्टा
एक ऋचा की।

पुरानी डायरी से -12 : श्रद्धा के लिए

13 दिसम्बर 1993, समय:__________                                 श्रद्धा के लिए


तुम्हारा बदन 

स्फटिक के अक्षरों में लिखी ऋचा  
प्रात की किरणों से आप्लावित
तुम्हारा बदन।


दु:ख यही है 
मेरे दृष्टिपथ में 
अभी तक तुम नहीं आई।
कहीं  ऐसा तो नहीं 
कि तुम हो ही नहीं !
नहीं . . . . 

पर मेरी कल्पना तो है – 
“तुम्हारा बदन 

स्फटिक के अक्षरों में लिखी ऋचा
प्रात की किरणों से आप्लावित
तुम्हारा बदन।”


री !

सुरसरि तट
सर सर लहर सुघर सुन्दर लहर कल कल टल मल सँवर चल कलरव रव री !
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हिन्दी कविता के प्रयोगवादी दौर में एक वर्ग ऐसा भी रहा जो छ्पे हुए शब्दों को भी एक तार्किक समूह में कागज पर रख देने का हिमायती था ताकि कविता की लय (अर्थ और विचार दोनों) छपाई तक में दिखे। उतना तो नहीं लेकिन सुधी जन की टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए यति की दृष्टि से पंक्तियों में तोड़ दें तो कविता यूँ दिखेगी:
_____________________________________
सुरसरि तट

सर सर लहर सुघर सुन्दर
लहर कल कल टल मल
सँवर चल
कलरव
रव री !