अध्यात्म कविता – 1

‘धम्मपद’ से …  

अत्तानमेव पठमं पतिरूपे निवेसये। 
अथञ्ञमनुसासेय्य न किलिस्सेय्य पण्डितो

॥12-2, 158॥

पहले अपने को ही उचित (काम) में लगावे, बाद में दूसरे को उपदेश दे। इस तरह पण्डित क्लेश को न प्राप्त होगा। 

अत्तना’व कतं पापं अत्तना संकिलिस्सति। 
अत्तना अकतं अत्तना’व विसुज्झति। 
सुद्धि असुद्धि पच्चतं नाञ्ञो अञ्ञं विसोधये॥12-9, 165॥ 
अपना किया हुआ पाप अपने को मलिन करता है। अपना न किया पाप अपने को शुद्ध करता है। शुद्धि और अशुद्धि अपने ही से होती है। दूसरा आदमी दूसरे को शुद्ध नहीं कर सकता।  
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