नामाकूल

नामपर नामसर नामचर नामखर 

नामभर नाममर नामोखर नामधर

नामखा नामपा नामआ नामजा

नामसा नामका नामभर नामकर

नामचा नामची नामसू नामभू

नामतू नामऊ नामफर नामतर

नामधा नामदान नाबदान नाम

नामकी नामड़ा नामजी नाममर

नामलिख नामपढ़ नामालो नामचना

नामथो नामथा नामबा नामजे नामघना

नामगा नामरो नामपोछ नामदो

नामधो नामगू नामराम नामसो।

अछ्न्द संग

शब्द चुप हैं कि उनकी जुबाँ काट ले गया कोई
मन में अन्धेरा है भावों की परछाइयाँ हैं गुम 
कुछ लगता ही नहीं कि वजूद हुआ दफन कहीं 
ऐसे में कैसे कह दें कि चहुँ ओर खलबली है? 


शांति है, स्तब्ध हैं सब गुमसुम अपने काम में 
बैठा लिया है संतुलन सफल स्याह ने शुभ्र से 
दिन कटने हैं, कटते हैं आराम से बिला वजह 
जिन्दगी बिला वजह, वक़्त बिला वजह बेवजह। 


शोर उठते हैं, उठते रहेंगे कि उठना है काम उनका 
क्या पड़ी है तुम्हें भागने की पीछे करो काम अपना ?
ये दुनिया है, ऐसी ही है, थी और रहेगी पसरी ऐसी
जो गुस्सा है, थूको पीकदान में, इसकी बखत इतनी।


चुप हूँ सोचता कि दिमाग जिन्दा खुराफात जिन्दा 
जिन्दा यूँ ज्यों जमीन में कसमसाता केंचुआ 
जब होंगी बारिशें और बिलों में भरेगा ताजा पानी 
निकल रेंगने कुचल जाने को करेगा मजबूर पानी।


पानी जब घुसता है ले हवाई बुलबुले बिलों में
हवस दहके उमसते हैं बीज फूटें अंकुर दिलों में 
मैं चुप काम करूँ अपना जमीन को छ्लनी बना 
मैं दफन नहीं रेंगता सुनता हूँ आहटें खलबली की। 

छ्न्दसा

इस रात रक्त उतर आया है आँखों में 
लाल डोरों को गारने निकले दूर सात घोड़े 
क्यों न तब तक सेज की सवारी कर लें?

मालूम है कि तुम्हें दूर जाना है
मालूम है कि यह चहन बेगाना है 
क्या कहूँ जो इतने दिन बाद आई हो ? 
लबों पर लजाये हर्फ सी फड़फड़ाई हो 
अब चाँदनी नहीं खिलखिलाहटों के साये हैं। 

न भूला चाहते चुम्बन चह चह
न भूला हाथों को हटा रखाते रह रह 
न भूला कपोलों को सटाते सह सह 
न भूला ताप को दबाते नह नह
पाप और पुण्य साथ नग्न नहाये हैं।  

क्यों पाखण्ड देह को क्षुद्र कह कर?
लिपटना क्यों वर्जना की साँस भर कर?
नहीं उफान अब वह तो क्या हुआ?
समय दाह पिघला अयस ठहरा हुआ
तड़प की धार छौंक छन छनछनाये है।

लिपटो अंग अंगना कि मुझे पूरी करना 
तुम्हारी वह अधूरी रचना – 
देह उत्सव पिघले शरीर 
स्वेद कण कपूर बन जल रहे तीर तीर …  

दफन कर दे

दफन कर दे उन किताबों को जो नहीं देख पाती उन्हें प्रलोभनी गूदे से दीगर

वहशी, दरिन्दे! पाक नहीं, न परवरदिगार उनमें, ये जन्नत दोजख की खबर

कुछ नहीं सिवा इसके कि आधी आबादी पर ताउम्र अजीयत का कहर।

वीणा मेरी ले विराम अब।




वीणा मेरी ले विराम अब 

 तान पुरानी गान व्यर्थ सब। 

धूप ज्यों छाया वास
विचरे मधुमास हास 
कल्पना रूदन त्रास 
कर्कश फ्यूजन विलास
स्वर लगते नहीं साथ अब 
वीणा मेरी ले विराम अब।

जीवन मलमास गाद
स्व भावित मल अपवाद
चीखें सम्वाद शाद 
संग लय अनुनाद नाद 
ऐसे में गीत! त्रास सब 
वीणा मेरी ले विराम अब।
…………….  

मघवा! तुम छोड़ो सिंहासन

धरा! घहर, लहर! न ठहर
पटक लहर, पटक कहर
लपक दामिनि दौड़े नभ
मघवा ** छोड़े अब सिंहासन।
कह दो न कोई दधीचि अब
देहदान के बीते युग
निपटेंगे वृत्र से स्वयं हम
मघवा! तुम छोड़ो सिंहासन।
भ्रष्ट तुम, तुम भ्रष्टभाव, सहना नहीं शाश्वत अभाव
गढ़ने को अब नूतन प्राण, देखो पिघले गन्धर्व पाँव
पौरुष ने छेड़ा राग काम, धरा विकल नव गर्भ भार
लेंगे नवसंतति पोस हम, 
मघवा! तुम छोड़ो सिंहासन
नवजीवन अन्धड़ ताप तप
फैली ज्योतिर्मय आब अब
निषिद्ध कराह, फुफकार अब
बुझी यज्ञ की आग अब
ढलका धूल में सोम सब
भूले अर्चन के मंत्र हम
अमर नहीं अब मर्त्य तुम
मघवा! तुम छोड़ो सिंहासन।
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** मघवा – इन्द्र, देवताओं का राजा 

नमी, पत्थर और सोना

(1) 

आँखें नम होती थीं, तुम पत्थर के थे। 
चौंधियाती हैं अब, सोने के हो गये हो। 
(2) 
नमी को चाहिये था सहारा, तुम्हें पत्थर में तराशा।
सहारे ने दिया ठसक ठिकाना, तुम्हें सोने से मढ़ दिया।