गुंजलक

शुभकामना सन्देश स्पैम बॉक्स में संख्या बढ़ाते हैं
स्वयं नहीं जाते तो भेज देता हूँ और सहमता हूँ
कहीं कोई सच्चा सन्देश तो नहीं चला गया उधर?
कहीं किसी शुभ की हत्या तो नहीं कर दी मैंने?
क्या करूँ कि मुझे सड़कों पर रोजमर्रा की वहशत दिखाई देती है?
क्या करूँ कि मुझे सड़कों पर रोजमर्रा की दहशत दिखाई देती है?
मैं क्या करूँ कि मेरे हाथ कई दिनों तक हटाते रहते हैं वह पत्थर
जिसे सड़क पर छोड़ दिया था किसी ने टायर बदलने के बाद?
मैं क्या करूँ कि होता रहता है हमेशा एहसास
कि मेरी ज़िन्दगी में कोई स्टेपनी नहीं –
खुद को देखता हूँ हजारो हजार सड़क भर भटकते।
क्या करूँ कि मुझे हो गई है स्थायी झुँझलाहट –
पत्थर उठा कर उस एस यू वी का नहीं तोड़ा कोई काँच एक?
स्याह शीशों के पीछे छिपे काले गुमनाम नामवर चेहरे
मुझे घूरते रहते हैं और मैं उन्हें देख तक नहीं पाता
मेरा संतुलन बिगड़ गया है,
क्या करूँ कि मुझे हमेशा चक्कर रहने लगे हैं?
मैं वह अकेला हूँ जिस पर अनुग्रह यूँ ही नहीं बरसते।
जब हजार लोगों की जमीन कब्जा होती है
जब बनता है दूसरे हजार लोगों की मौज को एक माल
तो मुझ पर गिरता है एक अनुग्रह।
गन्दी गली का मेरा मकान
अचानक ही राजमार्ग पर आ जाता है।
छत दबाती है मुझे, दीवारें सिकुड़ कर पीसती हैं
राजमार्ग के शोर से मेरी नींद हवा हो जाती है
मैं अचानक ही वी आई पी हो जाता हूँ –
मुहल्ले में पहले से और अकेला।
मेरे संगी हजार लोग हैं कोर्ट की फाइलों में पीलिया ग्रस्त
मैं रोगी हो गया हूँ।
________________
अच्छा  लगता है बीमार होना
कुछ दिन पड़े रहना कि
न खुद से खुद को कुछ उम्मीद रहे
और न दूजों को।
होता रहे यूँ ही खुदाई दीदार बराबर
भीतर मद्धिम आँच पर
कुछ पकता रहे बराबर –
अच्छा लगता है कुछ दिन
निज साँसों की महक का बदल जाना
जीने का अनुभव होता है नया
घट सकता है नया नित रोज –
तब भी जब कि बिस्तर पर पड़े रहें
और साँसें  तप्त होती रहें।
यह भान होता रहे
कि गरमी के सामान बाहर ही नहीं
भीतर भी हैं
और
गरमी चाहे जैसी हो
खुद ही झेलनी होती है।
झेलने की ताब बची है – अच्छा लगता है यह जानना।
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