ढाई आखर अब भी अधूरे हैं।

मैं – भर गया है मन का ड्राफ्ट कक्ष,
तुम – दो मीठे बोल तो फिर भी न बोले! 
अधरों की काँप – ढाई आखर अब भी अधूरे हैं। 


तुम – संगिनी की आँखों में झाँकते मुझे याद आओगे। 
मैं – उलटबासियाँ वास्तविक नहीं होतीं। 
दोनों चुप, मौन मुखर – विरोधाभासों में कुछ भी ‘आभासी’ नहीं होता। 


मैं – आज तुम्हारी साँसें अलग सी महकती हैं ।
तुम – आज देह पुष्पित योजनगन्धा, भर लेना साँस भर भर। 
दोनों चुप, आँखें अटकी एक साथ – झूमते निर्गन्ध पुष्पित सदाबहार पर।


तुम – तुम्हारे लिये रोटियाँ गढ़ने की मशीन नहीं होना मुझे! 
मैं – सारी बुनियादी बातें बस होती हैं, गढ़ना नहीं होता उन्हें। 
छलछल तुम – “बड़े छलिया हो!”, मनबढ़ मैं – “यूँ ही नहीं पकते गेहूँ के खेत!”      
…. 
…. 

ढाई आखर अब भी अधूरे हैं। 

     

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