असंगति – गधे ही कवि होते हैं

जैसा कि युगों से होता आया है,
अच्छे गधे अब भी पाये जाते हैं।
माफ कीजिये,
अच्छे आदमी गधे कहलाते हैं।
(अच्छाई और गधापन युगों युगों के साथी हैं।)
माफ कीजिये,
बुरेऔर गधेपाये जाते हैं।
(बात जम नहीं रही, अगली पंक्ति पर चलते हैं।)

गधों की कुछ आदतों के बारे में लिखते हैं।
(आदतों और गधों में बहसियाना सम्बन्ध होते हैं)
उन्हीं गधों के बारे में जो
जब कि आसमान में सूरज को टाँग
बुरे बेतहाशा भागते रहते हैं,
वे बस उछलते रहते हैं।
उनकी टाँगों के साथ
सम्भावनायें बँधी होती हैं। 
सम्भावनायें
खुद के बनाये बन्धनों के कारण
फलित नहीं हो पातीं
और उन्हें दुत्कारती रहती है।
उनकी दुत्कार का उत्तर
वे निजी विमर्शसे देते हैं।
बुरे उनके विमर्शको
रेंकना कहते हैं
हँसते हैं
ठहर कर उनकी टाँगों को परखते हैं
बन्धन यथावत पा खुश होते हैं
और गधों की पीठ पर डन्डे जमा
हँसते हैं,
गधे और जोर से रेंकते हैं
यह क्रम तब से चला आ रहा है
जब इव ने आदम को सेव खिला कर
पटाया था।
और ईश्वर ने चुपके से दोनों के
दो दो भाग कर दिये थे
बुरा आदम, बुरी इव
गधा आदम, गधी इव।
स्वर्ग से उसने दो नहीं
चार जन ठेले थे।
(अब तक की पंक्तियों में
बहुत सी असंगतियाँ हैं।
काव्य दोष, तर्क दोष
फलाना, ढिमकाना
ये दोष, वो दोष सब हैं
वैसे वह सम्भावना वाली बात
सही है।
आप को अब तक लग जाना चाहिये कि
गधे ही कविता रचते हैं
कवि गधे होते हैं
और
गधे तो गधे ही होते हैं।)
गधे पढ़ते हैं
बुरे भी पढ़ते हैं
लेकिन
एक बुनियादी अंतर है
बुरे आस्तिक होते हैं
इसलिये ईश्वरदत्त प्रवृत्तियों को
पढ़ाई से पैना करते हैं
और चलते बनते हैं।
उनकी किताबें
बनती हैं चूल्हों की आग
जिनसे बुझती है
पेट की आग
जो वास्तव में होती नहीं
लगाई जाती है।
(सही कहे
पेट की आग को
एक गधा ही नकार सकता है।)
गधे आस्तिक, नास्तिक
या कुछ नहीं भी हो सकते हैं।
(ईश्वर को कोई अंतर नहीं पड़ता।)
गधे पढ़ते हैं
कुछ पढ़ाई को ढोते हैं
कुछ किताबों को ढोते हैं
कुछ उससे दिमाग बोते हैं।
दिमाग पैदा करना
बहुत जहीनी काम होता है
दिमाग की कमी के कारण
दिमाग नहीं उपजता।
भूख लगती नहीं
आग जलती नहीं
बुझती नहीं
और गधे धीर वीर योगी
सनातन जूझते हैं।
दिमाग नहीं तो दिमाग कैसे उपजे?
इस आदिम प्रश्नचिह्न के आगे
बस खड़े रह जाते हैं
और
बुरे कहाँ से कहाँ पहुँच जाते हैं।
(जी हाँ, मामला जटिल है
और
गर आप कहा समझ नहीं पा रहे
तो यह तय है
कि
गधा विमर्श सही जा रहा है
गधों की बातें गधे..युप्प!..
कवि की जुबानी।)
घर के ईश्वर की सहमति पा
जब बुरे सूरज को उतार देते हैं –
आसमान से।
तब
गधे ध्यानस्थ होते हैं
कालजयी रचनाकर्म को
और
बुरे बस इंतजार करते हैं
उनकी किसी असमय रेंक का।
उनकी रेंक बुरों की मेधा की औषधि बनती है
शक्तिवर्धक बनती है
और रात ढलती रहती है।
जब सुबह होती है
और बुरे सूरज को टाँगने के श्रम
से लथपथ लाल होते रहते हैं,
गधे सामूहिक रेंकते हैं –
क्रांति हो गई!
हमने कर दिखाया
और फिर छा जाती है
उछलन।
गधे उछलते लगते हैं
बुरे सूरज के साये में भागने लगते हैं …
धूल गुबार त्रस्त
धरती चुप देखती सहती रहती है।
जैसा कि पहले बताया
गधे ही कवि होते हैं
और कविता की रेंक के लिये
दुनिया का दो टुकड़ों में
    स्पष्ट टुकडों में –
बँटा होना आवश्यक है – अच्छे और बुरे।
कुछ भी या तो अच्छा होता है
या बुरा
दोनों एक साथ नहीं हो सकते।  
अच्छाई और गधेपन में कोई अंतर नहीं
जिस दिन अंतर हो जायेगा
उस दिन कविता गुम हो जायेगी –
गधापन है
इसलिये कविता है।
दुनिया कायम है
कि कायम हैं गधे
कि कायम है कविता।
(यह आगत प्रलय की रेंक नहीं
एक कविता है।
असंगत दिखती है
जो कि इसकी गति है।
और
इसमें सूरज जैसी वाहियात चीज के लिये
कोई जगह नहीं।… 
… वैसे आप किस श्रेणी में आते हैं?)         
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4 thoughts on “असंगति – गधे ही कवि होते हैं

  1. पता नहीं मैं गधा हूँ या नहीं ! गर होता तो अच्छा होता ! इस संसार में गधे कम होते जा रहे हैं ! चलिये कोई बात नहीं अंत में जीत गधे (अच्छाई)की होगी और कविता पढ़कर हर गधा (अच्छा आदमी) खुश होगा । बहुत अच्छी लगी आपकी रचना । बधाई एवं शुभकामनाएं ।

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