बड़े नासमझ हो।

सच कहूँ? 
मुस्काते भोले लगते हो 
कविता कहते बोदे लगते हो – 
मैं कैसी लगती हूँ? 

मुझे भोला या बोदा नहीं बनना
मुझे कुछ नहीं कहना। 

तो क्या मैं तुम्हें अच्छी नहीं लगती?

समझ का फेर है।
न समझो वही ठीक है। 

क्यों? 

समझोगी तो 
न कविता होगी और न मुस्कान। 
मैं यूँ ही इस उधेड़ बुन में रहूँगा 
कि तुम कैसी लगती हो? 
और तुम चल दोगी कहते हुए – 
बड़े नासमझ हो। 

   

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