डीहवारा की उपलब्धि से आगे…


डीहवारा की उपलब्धि से आगे … 

नहीं रे! उपलब्धि की नहीं चाह मुझे
प्रेमतापस हूँ, भटकता रहा युगों से
उसे ढूँढ़ता जो मेरे जैसा हो और 
जिससे मैं अपनी बात कह सकूँ। 

तुम्हें देखा तो लगा जैसे सब पाया
चोट छील नहीं, वे सिर्फ मेरी बाते हैं 
जो मैंने की हैं – तुमसे जो अपने लगे।

तुम गढ़ा गए,उकेरा गए उन बातों से 
तो ज़रा पूछो अपने प्रस्तर अंत: से
प्रेमिका जो अब सामने आई है 
क्या वही नहीं जिसे तुमने चाहा था? 
जिसे सँजोए रखा इतने दिनों से 
आंधियां सहते
तूफान तोड़ते
मेघ रीते 
घाम जलते 
चन्द्र रमते! 
तुम्हारा तप सफल हुआ 
जैसे मुझ तापस का। 
जन्मों के पुण्यकर्म फलते हैं 
तब मिलते हैं दीवाने दो
तब दिखता है ऐसा कुछ। 
उत्सव मनाओ – 
तप नष्ट नहीं, यह सिद्धि है
हमारी उपलब्धि है,
जो मिल गई अनायास –   
प्रेम में ऐसे ही तो होता है।
नहीं, ऐसा लगता है
भटकते युग याद कहाँ रहते हैं! 

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10 thoughts on “डीहवारा की उपलब्धि से आगे…

  1. 'तुम्हें देखा तो लगा जैसे सब पाया' सही बात. फॉर एक्जाम्पल: आज के जामने में भी ७ फिगर सैलरी के साथ जीरो फिगर और विविधभारती सुनने वाली लडकियां होती हैं 🙂 डिफिकल्ट, कोम्प्लेक्स… बट पोसिबल. ऐंवे ही कुछ याद आ गया.

  2. मैंने इसे पढ़ा तो सोचा लिखूँ क्या?वहाँ गया…सोचा वहाँ कुछ साध पाऊँगा, किन्तु फिर से अकिंचन लौटा.पर इस रस की अनुभूति के लिए कम से कम आभार तो कहता चलूँ.

  3. डीहवारा की 'उपलब्धि' इस कविता की प्रेरणा बनी, खुशी हुई.न जाने कैसी है यह प्यासनहीं जिसका है कोई अंत स्वयं की गढता जाऊं मूर्तिशेष रह जाएँ रूप अनंत कभी तो टूटेगी यह सांसअचंचल होंगे थककर प्राण मिटेगी पागल मन की प्यास मिलेगा विह्वलता से त्राण मगर कह देना उसको लक्ष्यनहीं कर पाता मन स्वीकार कहीं कुछ रह जायेगा शेषअचंचल प्राणों के भी पार.

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