पसीना

(1) 
पसीना 
टेबल पर टपकता है। 
खेत में टपकता है। 
फर्श पर टपकता है। 
दिन भर काम करते थक जाता है –
बिस्तर में रिसता है।

(2) 
पसीना 
निकलता निर्गन्ध है ।
हवा, इत्र, फुलेल, साबुन
बिगाड़ देते हैं आदत। 
कुछ भी कर लो 
गन्धाता रहता है। 


(3) 
जब डूब जाता है पैसा मार्केट में। 
जब परीक्षा के सवाल
किताबी याददाश्त गुम कर देते हैं।
जब फुलाई सरसो 
रातो रात लाही से मार जाती है। …
बिना परवाह किए कि 
बाहर जाड़ा है, गर्मी है कि बरसात 
पसीना निकलता है, 
हवा से जुगलबन्दी करता है 
और धीरे से दे जाता है
फिर से उठने लायक साँस।


(4) 
बाहर की दिन भर की चखचख
रोज गन्दे होते घर की सफाई
धीरे धीरे घिसते रहते हैं रिश्ते को।
इससे पहले कि रिश्ता दरके  
पसीना रातों को प्रीत के लेप लगाता है 
और सुबह तैयार हो जाती है – 
एक दिन भर चखचख 
एक दिन भर गन्दगी 
झेलने को। 

  

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16 thoughts on “पसीना

  1. गिरिजेश भाई साहब, आप की यह पोस्ट कल सुबह की ब्लॉग वार्ता के लिए ले रहा हूँ आशा है आपको कोई ऐतराज़ नहीं होगा ! बताना जरूरी था क्यों कि आपका ऐसा आदेश था ! आपका नंबर नहीं है मेरे पास नहीं तो आपको फोन कर अनुमति ली होती मैंने ! आपकी यह रचना बेहद उम्दा लगी !सादर आपका |

  2. इस रचना की संवेदना और शिल्पगत सौंदर्य मन को भाव विह्वल कर गए हैं। सटीक बिंब आपके काव्‍य-शिल्‍प को अधिक भाव व्‍यंजक बना ही रहे हैं। जमीनी सच्‍चाइयों से गहरा परिचय, आपके कवि मन की ताकत है। व्‍यापक सरोकार निश्चित रूप से मूल्‍यवान है।

  3. पसीना किसान कामजदूर काअलग है उस पसीने सेजोपरीक्षा कक्ष में छूटता हैकठिन सवाल सेऔर उससे तो बिल्कुल अलग है जो ए.सी. बंद हो जाने पर माथे पर उग आता हैथोड़ा पसीना कविता पढ़कर भी आयादुबारा पढ़करथोड़ा समझ में आयालो मैंने कैसा तुक से तुक मिलाया

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