चित्रा का नेह, बिखरे पूजा पुष्प

village_sky 

गाँव का आसमान
वत्सल वत्सल
परदेसी लाल आया है! 
 chitra

‘चित्रा’ हरसाई
धा धा आई
श्वेत श्याम आँचल में
बाँध के रखा था
खुल गए बन्ध।
बरस रही नेह धार
धरती तर तरल तरल।

harsingar

हरसिंगार! तुमने बिखरा दिए
तज दिए साज शृंगार।
ये जो भूमि पर बिखरे हैं
जो रह गए अटके ही
मेरी पूजा के ही पुष्प हैं !
जिन्हें बीनते हैं लोग
देवी की आराधना हेतु।
जिन्हें यूँ ही बिखेर दिया –
पूरे परिवेश में
उन्हें
मैं किस हेतु सहेजूँ?
किसके लिए??

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10 thoughts on “चित्रा का नेह, बिखरे पूजा पुष्प

  1. @'चित्रा' हरसाई धा धा आई श्वेत श्याम आँचल में बाँध के रखा था खुल गए बन्ध। बरस रही नेह धार धरती तर तरल तरल।—जायसी के यहाँ 'मघा' की धार है–बरसै मघा झकोरि-झकोरी मोरे दुनों नैन चुएं जस ओरी.

  2. इन चित्रों से संबंधित वातावरण ने ही कवि को ये शब्द रचने की प्रेरणा दी है। ऐसा मुझे महसूस हो रहा है। शब्दों ने इस दश्य को और विस्तार दे दिया है।

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