…क्षितिज नहीं

तुम मिली।
अशेष
सभी कामनाएँ।
मेरी दृष्टि में
अब कोई क्षितिज नहीं।

थोड़ा ठहर मेरी महबूब!
वो बारिश भीन लेने दे।
हर्फ सूख तो लें
जो खतूत फिर से लिखें।
वो ठिठुरन अभी तक है
साँसों की सरगम
दुश्वारियाँ हैं 
ज़िन्दगी है दहकती
तुम्हारी महकती साँसों से
आहें बहकतीं।
उन्हें थाम तो लूँ
थोड़ा ठहर मेरी महबूब!
भोर को भीन लेने दे।
भीन लेने दे
मैं अब भी वही हूँ –
उन्हीं सीढ़ियों पर।
धुन्ध
अब भी टपके जा रही है
टप! टप!!
टप! टप!!
थोड़ा भीन लेने दे।
थोड़ा ठहर लेने दे।
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15 thoughts on “…क्षितिज नहीं

  1. आचार्य रजनीश ने कहीं एक चीनी चित्रकार का उल्लेख किया है। वह चित्रकार अपने चित्र पर इतना मुग्ध हुआ कि उसी में खो गया। हाड़ मास कुछ न बचा। … कहते हैं बावरी मीरा भी अपने कान्हा की प्रतिमा में समा गई। मेरे मस्तिष्क के दो भाग हैं। एक कहता है कि यह सब कोरी गप्प है। दूसरा कहता है – आह! क्या बात है। काश! ऐसा फिर कभी कहीं हो पाता।

  2. दुविधा से बाहर आकर एक मार्ग (सत्य का) तो पकडना ही पडेगा। अब चीन के बारे में क्या कहा जाये? ओशो के बारे में ज़रूर कह सकता हूँ "नो कमेंट्स"। बचीं मीरा, वे तो प्रभुमय ही हैं, अराध्य हैं। उनकी सिर्फ एक बात मुझे भी रखनी है कभी।

  3. ..यह पवित्र बेला। सुखानिलोsयं काल:। कोई विश्वामित्र नहीं जो रवि ऊर्मियों की प्रतीक्षा में ऊषा से अमृत बिखेरने को कहे। नक्षत्रों की गुप्त मंत्रणा जारी है और ऊषा आँचल में मुँह छिपाए कहीं फिर रही है। हर तरफ है बस तुम्हारे प्रेम की धुन्ध। बरस रहा है – टप, टप, टप। ….ऐसे में कविताएँ झरती हैं तो कोई अचरज नहीं, बारिश की बूदें के साथ..टप, टप, टप।..बहुत सुंदर।

  4. किसी -किसी का मिलना ऐसा ही भर देता है …फिर कोई कामना नहीं , कोई लालसा नहीं …पास नहीं ,फिर भी दूर नहीं …तुम मिली।अशेषसभी कामनाएँ।मेरी दृष्टि मेंअब कोई क्षितिज नहीं।मीरा आपकी इन पंक्तियों में ही तो समाई है ….कल्पना हो तो भी !

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