अनुष्टुप घबराने लगे हैं

तब जब कि अनुष्टुप घबराने लगे हैं
गालियाँ, सार्थक अभिव्यक्ति या दोनों?
या कुछ भी नहीं ??
मेरे कवि ! तुम्हें पुकारा है।

सावन की फुहारें हैं या
भूमि पर नाचते ढेर सारे आसमान ?
थिरकनें है झमाझूम
 झड़ियों में बयान
मन्द घहरती तान पर
कजरी के गान पर
झूमने को तुम्हें पुकारा है |

देश भदेस है
गोपन निर्लज्ज हो
वीथियों में घूम रहा ।
हर चौराहे की प्रतिमा पर
अश्लील से पोस्टर हैं
हम हैं ठिठके
शब्दकोश रिक्त हैं
अर्थानर्थ तिक्त हैं ।
बयानबाजी के खिलाफ
मृदु अर्थगहन गान को
तुम्हारी राह मैं तक रहा।

मेरे कवि! आओ न !!

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8 thoughts on “अनुष्टुप घबराने लगे हैं

  1. इतनी विषम परिस्थितियों में कवि का आना अव्श्यम्भावी है , उसे आना ही होगा और जो कुछ वीथियों में है उसे स्थानापन्न करके वहाँ सत्य की स्थापना करनी ही होगी .. मैं आपकी इस पुकार में शामिल हूँ ।

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