न दो

घिर आई बदलियाँ कोई नाम न दो 
स्याह शाम दिये को इलज़ाम न दो


तमाम शहर रोशन गलियों में आब
बेनूर से चेहरे कोई पहचान न दो


ठंडक से परेशाँ घर घर की गर्मी    
बिस्तर बेसलवट वस्ल नाम न दो


बच्चों की रवायत जो खेले खामोश 
ग़ुम खिलखिल को कोई पयाम न दो  

है तासीर इनकी उलूली जुलूली
मेरे गीतों को बहरों की तान न दो

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