लघु गीत

बादर साज नयन रहे कोरे 
उड़ रही धूर मलय संग भोरे

उमस की कोठ सजन लिए ओट 
पेम के नेम तजत रहे सो रे
उड़ रही धूर मलय संग भोरे । 

ऋतु बदल रही ऋतु अखर गई
सेज दुखी नहिं ताँतन तोरे** 
बादर साज नयन रहे कोरे। 
 
** प्रणय केलि के समय खाट के तंतुओं की चरमराहट  
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15 thoughts on “लघु गीत

  1. अब हम शायद बात नहीं समझ रहे हैं ….फिर भी खुलासा करना चाहते हैं जी…बादर साज नयन रहे कोरे …..बादल हैं फिर भी नयन कोरे हैं, अर्थात खाली हैंउड़ रही धूर मलय संग भोरे ….अर्थात अलसुबह की हवा में भी धूल उड़ रही है…..अब इसमें सावन , या वर्षा की बात तो हम नहीं देख रहे हैं….अब हो सकता है की कोई कोई चालीस पर दू पार कर जाता है तो सठिया जाता है ….जो आज कल हमरी हालत है….तो कह नहीं सकते हैं…बाकि हमको यही बुझाया है…कवित सुन्दर है….बल्कि कहें तो बहुत सुन्दर है…..आभार….

  2. @ अदा जी,आप एकदम सही समझ रही हैं। बदरी, उमस, घुटती कोठरी, प्रिय का रूठना, भीतर बाहर दोनों ओर वर्षा के लिए उपयुक्त स्थिति लेकिन बाहर भोर की सुगन्धित हवा के साथ धूल है तो भीतर मिलन की साक्षी सेज उदास है। …साजन को जिन परिस्थितियों में प्रेम की वर्षा कर देनी चाहिए, उन्हीं परिस्थितियों की आड़ ले मुँह फुलाए सोया हुआ है।

  3. पहले थोड़ा-थोड़ा समझ में आया था. टिप्पणी के बाद पूरा समझ में आ गया… इतना अच्छा लिखते हैं आपलोग मैं तो स्तब्ध रह जाती हूँ बस.

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