कविता नहीं – प्रलय प्रतीति

बरसी थी चाँदनी
जिस दिन तुमने लिया था
मेरा – प्रथम चुम्बन।
बहुत बरसे मेह
टूट गए सारे मेड़
बह गईं फसलें
कोहराम मचा
घर घर गली गली
प्रलय की प्रतीति हुई।
बेफिकर हम मिले पुन:
भोर की चाँदनी में
मैंने छुआ था तुम्हें
पहली बार
(चुम्बन में तो तुमने छुआ था मुझे !)
पहली बार तुम लजायी थी
घटा घिर आई थी
उमड़ चली उमस
खुल गए द्वार द्वार
मचा शोर
चोर चोर
तुमने लुटाई थी
बरसों की थाती
मैंने नहीं चुराई थी।
 …
इतने वर्षों के बाद
आज भी  आसमान में घटाएँ हैं
लेकिन कहीं कोई कोहराम नहीं
कहीं कोई शोर नहीं
जब कि पार्क में
बैठा है युगल
मुँह में मुँह जोड़े।
न होता उस दिन
अपराध बोध
तो आज हम अगल बगल खड़े
कर रहे होते विमर्श
तुम्हारी कमर के दर्द पर
मेरे घुटनों की सूजन पर ।
कहीं तुम भी किसी जगह
सोचती होगी यही
अब कोई मेघदूत नहीं
जो सन्देश लिए दिए जाँय।
अब उमर भी कहाँ रही ?
घर की छत न टपके
मरम्मत के लिए
राजगीर आया है
भीतर से फरमान आया है:
नीचे आओ
नज़र सेंकनी बन्द करो
कल तूफान आएगा
टीवी ने बताया है।
मैंने सारी उमर
प्रलय गीत गाया है
कैसे थे सुर उस दिन !
जब  प्रलय प्रतीति हुई थी?
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20 thoughts on “कविता नहीं – प्रलय प्रतीति

  1. @ इतने वर्षों के बादआज भी आसमान में घटाएँ हैं लेकिन कहीं कोई कोहराम नहींकहीं कोई शोर नहीं अमां यार भरी जवानी में निराला बन रहे हो…..निराला जी ने बुढौती में यह सब लिखा था कि – अब वो ललनाएं नहीं हैं….पत्ते कोमल नहीं रहे…..वगैरह वगैरह 🙂 कविता थोडा बोल्ड है लेकिन ब्यूटीफुल है।

  2. मैंने सारी उमरप्रलय गीत गाया हैकैसे थे सुर उस दिन ! जब प्रलय प्रतीति हुई थी?-सुर तो उत्तम ही रहे होंगे..बढ़िया रचना.

  3. …"न होता उस दिनअपराध बोधतो आज हम अगल बगल खड़ेकर रहे होते विमर्शतुम्हारी कमर के दर्द परमेरे घुटनों की सूजन पर ।कहीं तुम भी किसी जगहसोचती होगी यही"इस 'अपराध बोध' को 'साहस की कमी' या 'जमाने का लिहाज' भी कहते हैं कुछ 'अकवि'…:)अच्छी कविता… ६/१०आभार!

  4. @ हिमांशु जी हाँ, मुहावरा ही है लेकिन यहाँ उसे अभिधा में प्रयोग किया । हमारी आदत इसे मुहावरे की तरह सुनने समझने की है। प्रचलित से अलग अभिधात्मक प्रयोग एक अलग प्रभाव की सृष्टि करता है जिसके लिए काव्य आलोचना में एक तकनीकी टर्म भी है। मुझे भूल गया है। आप को याद हो तो बताइए।आज कल आप ने रचना लिखना बन्द सा कर दिया है। मैं मुँह फुलाए हुए हूँ (मुहावरे की तरह समझें :))

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