धुत्त ! ऐसे ही।

प्रात समय
किरणें झूमें गली गली
हरसिंगार झर झर झर झर
बन्द आँखें तुलसी के बिरवा
खुले केश छू लूँ?
धुत्त !
सुनो कुकर की सीटी
..गैस धीमी कर दो।

साँझ हुई
कर्मठ बिजली बिखेरे
चाँदी सोना गली गली
आँचल ढका मस्तक
लौ लगाती दीप बाती
लाइट बुझा दूँ  ?
धुत्त !
देवता द्वार से लौट जाएँगे।

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18 thoughts on “धुत्त ! ऐसे ही।

  1. कुकर को एक झटके में कुक्कुर पढ गया ! डिसलेक्सिया !!!!!!!!!! दुबारा पढ़ा तो कुछ मतलब साफ हुआ ! कविता अच्छी है !

  2. ऐसा सर्जन करने वाला हमारे बीच है…निहाल हैं भईया हम तो ! अरविन्द जी की टिप्पणी हम कर सकते हैं क्या…"संस्कारों की जकड़न और निसर्ग की फडकन …."!जबरदस्त !

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