एक प्रश्न

आज कल एक प्रश्न बहुत सता रहा है – पुरुष शरीर पर उतनी कविताएँ क्यों नही हैं जितनी नारी शरीर पर ? 
तुलसी टाइप नहीं ..ऐसी जो 
बबूल के काँटों का राग रचें, 
बाहु मांसपेशियों में मचलती मछलियों की रवानी के छ्न्द गढें,
मुक्त अट्टाहस में गूँजते प्रलय रव को सुनें सुनाएँ,
वक्ष की रोमावलियों पर कोमलता को सँभालती रुक्षता को पखावज नाद दें
 .. क्यों नहीं हैं? 


मैं पुरुष शरीर पर ऐसा कुछ रचना चाहता हूँ:
शत घूर्णावर्त तरंग भंग उठते पहाड़ 
जल राशि राशि पर चढ़ता खाता पछाड़ 
तोड़ता बन्ध प्रतिसंध धरा हो स्फीत वक्ष 
दिग्विजय अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष  (निराला, राम की शक्ति पूजा) 


जाने कब हो पाएगा ?
दिनकर ! तुम्हारी उर्वशी के छ्न्द कब इस आकाश में उतरेंगे?
 

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18 thoughts on “एक प्रश्न

  1. बिलकुल बिलकुल मैं भी तो यही पढने समझने को तरस गया हूँ गिरिजेश भैया …..कब मिलेगीं ये देखने को …..राम के व्यक्तित्व वर्णन में यही तो है ……

  2. क्या इसलिए कि पुरुष-प्रधान समाज में पुरुष अधिक कवितायें लिखते हैं या इसलिए कि पुरुष अधिक उन्मुक्त हो सकते हैं या इसलिए कि नारीओं के करने को कविताई जैसे ठलुआ काम के बजाये कहीं और अधिक महत्त्वपूर्ण काम पड़े हैं.

  3. देख लेना अब पुरूष देह पर भी कविताएं लिखी जाएंगीपुरूषों पर भी उन्मुक्त प्रहसनावली गढ़ी जाएगीलेकिन ''लेकिन''लिखने वाले पुरूष ही होंगेस्त्रियां फिर ठगी जाएंगी..समलैंगिकता संबंधी अदालती फैसले के आलोक में स्त्रियां फिर ठगी जाएंगी……- BTW बहुत अलग मुद्दा उठाया है आपने तो।

  4. वैसे, ई ससुरा जमाना ही ऐसा आ गया है कि अब किसी के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता…..छीछालेदर करवा के रख दिया है कम्बख्तों ने….लड़का-लड़का…..लड़की-लड़की….हुँह… ऐसे में रसप्रिया, मेघप्रिया…फलां फलां लिखना पड़ जाय तो समझ सकते हैं कि लिखने वाले को दस बार कन्फर्म करना होगा कि बंदा / बंदी किस टाईप का है 🙂

  5. सतीश जी की पहली टिप्पणी से सहमत. वैसे कविता भले न बहुत लिखी गयी हों, अरविन्द मिश्र जी ने लेख तो खूब सारे लिखे हैं पुरुष सौन्दर्य पर. और वो भी गजब.वैसे जो बात आपको पुरुष के शारीरिक सौन्दर्य के बारे में खटकती है, वही बात मुझे नारी के आन्तरिक सौन्दर्य के विषय में, विशेषतः संस्कृत-साहित्य में नारी के शारीरिक सौन्दर्य का वर्णन तो बहुत हुआ है, पर उनके गुणों के विषय में कम लिखा गया है… नायक-भेद और नायिका-भेद का आधार भी पुरुषों में गुण हैं और स्त्रियों में पुरुषों से सम्बन्ध का आधार.अब अगर घूम-फिरकर मैं ये बात कहूँ कि नारी-सौन्दर्य पर अनेकों कवितायें लिखने का कारण उन्हें मात्र देह के रूप में देखे जाने से सम्बन्धित है, तो आपलोग इसे नारीवादी दिमाग की खुराफाती फितरत मान लेंगे. तो मैं कुछ नहीं कहती.

  6. @ हिमांशु जीअरे महराज शुभ काम में देरी क्यों? रचिए । बबूल के काँटों का राग रचें, बाहु मांसपेशियों में मचलती मछलियों की रवानी के छ्न्द गढें,मुक्त अट्टाहस में गूँजते प्रलय रव को सुनें सुनाएँ,वक्ष की रोमावलियों पर कोमलता को सँभालती रुक्षता को पखावज नाद दें प्रतीक्षा रहेगी

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