…प्रेम को

हुए नयन बन्द
टपके मधु बिन्दु
अधर पर अधर
और मधुर
हंसी
लाज घूंघट
झांक गई भाग
दसन अधर
मन सन सन
हाथ बरज हाथ
न करो स्पर्श
काम कुम्भ
हाथ झिटको नहीं !
बस रखो वहीं
सुख सुख
गलबहियां क्या खूब !
छू रहीं अनछुओं को
तार रहीं
अस्पृश्य को
प्रेम को।
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