सापेक्ष दौर

मेरे कुकर्मों की निन्दा न करो
मेरे कुकर्म निम्नतर हैं
मेरे कुकर्म तुम्हें स्वीकार्य होने चाहिए:
उसने बलात्कार किया – तुम चुप रहे
उसने घोटाला किया – तुम चुप रहे
उसने देश को समझौते के नीचे दफन कर दिया – तुम चुप रहे
आज मेरे निम्नतर कुकर्म पर
तुम इतने प्रगल्भ क्यों हो?
तुम पक्षपाती हो
तुम उसके साथी हो
तुम्हारे मन में चोर है –
तुम्हें याद दिलाता हूँ
तुम्हारी कसौटी ।
तुम्हें दुनिया में हो रहे
हर कुकर्म , हर अत्याचार, हर घपले
से गुजरना होगा
उन पर लिखना होगा –
इसके बाद ही तुम लिख सकते हो मेरे स्याह कर्म
कराह सकते हो
मेरे कुकर्मों की तपिश से झुलसते हुए –
बेहतर है चुप रहो जैसे पहले रहे थे
तुम्हारा मौन  तुम्हारा कवच है
गारंटी है
कि
तुम निरपेक्ष हो इस सापेक्ष दौर में –
बोलने पर तुम्हें सफाई देनी होगी :
उसने बलात्कार किया – तुम चुप रहे
उसने घोटाला किया – तुम चुप रहे
उसने देश को समझौते के नीचे दफन कर दिया – तुम चुप रहे
क्यों ? 
.. अब देखो न तुम्हें इस ‘क्यों’ पर टाँग 
मैंने अपने पग बढ़ा दिए हैं
एक और कुकर्म के पथ पर – 
उम्मीद है कि टँगे हुए तुम 
चुप रहोगे। 
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8 thoughts on “सापेक्ष दौर

  1. बेहतर है चुप रहो जैसे पहले रहे थेतुम्हारा मौन तुम्हारा कवच हैगारंटी हैकितुम निरपेक्ष हो इस सापेक्ष दौर में -बोलने पर तुम्हें सफाई देनी होगी :-बिल्कुल सही कहा!! उम्दा रचना!

  2. तुम्हें दुनिया में हो रहेहर कुकर्म , हर अत्याचार, हर घपलेसे गुजरना होगाउन पर लिखना होगा – इसके बाद ही तुम लिख सकते हो मेरे स्याह कर्म कराह सकते होमेरे कुकर्मों की तपिश से झुलसते हुए -बेहतर है चुप रहो जैसे पहले रहे थे तुम्हारा मौन तुम्हारा कवच हैगारंटी हैकितुम निरपेक्ष हो इस सापेक्ष दौर में – बोलने पर तुम्हें सफाई देनी होगी :काश की इन सेकुलरों और ब्लॉगजगत पर मौजूद इन पैगम्बर के दूतो के पल्ले भी कुछ पड़ता इन पंक्तियों में से !

  3. अब जब आप जबरदस्ती चुप कराने पर तुल ही गए हैं तो लो चुप ही हो जाते हैं वैसे भी हम पहले ही कहाँ बोलते थे -अब आप अपने हैं तो आगाह करना धर्म समझा !

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