पाखी ! न बोल।

पाखी !
न बोल साखी 
हवा साखी 
पेंड़ साखी 
मानुख न सुनेगा
न आएगी बारी 
पाखी न बोल –
साखी।

छाँव सूखे
पत्ते इकठ्ठे 
कोई न बैठे  
जो सुने साखी 
न बोल –
पाखी।

न बोल 
बच्चे – 
नहीं किलकते ।
एनीमेशन 
उम्दा पाखी  
सम्मोहित देखते
आँखें निकलीं 
पसरी खामोशी 
आवाज चहचह 
इलेक्ट्रॉनिक –
पाखी न बोल। 

तेरे बोल 
कभी गीत
कभी साखी
कभी लोरी
कभी फुसलावन
कभी बस मनभावन – 
थे – 
अब नहीं हैं । 
… बहरे हैं –
पाखी न बोल। 
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6 thoughts on “पाखी ! न बोल।

  1. पाखी तू बोल हिय-मर्म खोल कोई सुने न सुने बाऊ सुनेगा !कविता में गुनेगा !.साखी बनेगी स्याही सियाही सियाही !आलोकित होगा थका – हारा – राही !……. पाखी तू बोल ,,……. हिय – मर्म खोल ,, .मिट जायेंगे सब उजड्ड , उजबक !तेरी नासर्गिकता का कोई न मोल !……… पाखी तू बोल ,,……….. हिय – मर्म खोल ,,.आभार बाऊ !!!!!!!!!!!!!!!

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