फागुन फागुन ……फागुन फागुन

(1) 
फागुन ने चूमा
धरती को –
होठ सलवट 
भरा रास रस। 
भिनसारे पवन 
पी गया चुपके से –
.. खुलने लगे
घरों के पिछ्ले द्वार । 
(2) 
फागुन की सिहरन 
छ्न्दबद्ध कर दूँ !
कैसे ?
क्षीण कटि – 
गढ़न जो लचकी ..
कलम रुक गई।
(3) 
तूलिका उठाई – 
कागद कोरे
पूनम फेर दूँ।   
अंगुलियाँ घूमीं 
उतरी सद्यस्नाता –
बेबस फागुन के आगे। 
(4) 
फागुन उसाँस भरा 
तुम्हारी गोलाइयों ने –
मैं दंग देखता रहा
और 
मेरी नागरी कोहना गई ।
लिखूँगा कुछ दिन
अब बस रोमन में –

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11 thoughts on “फागुन फागुन ……फागुन फागुन

  1. शुक्र मनाइए नागरी खाली कोहना गई गई….झाडू-झउवा नहीं ले आई …और आप रोमन से बहुते चिढ़ते हैं…इसी लिए कह दी होंगी …आज के बाद खाली रोमन में लिखना है….बढियां सजा मिला है आपको…हाँ नहीं तो…:):)

  2. गोलाइयाँ उसाँस लें तो नागरी बहक-सहक जाये,कोहनाये क्यों ? गोलाइयों से तो सजती है उसकी देंह !रोमन निपट तिरपट – फागुन में उसकी कैसी प्रीति ! उल्टा-सुल्टा लिख कर फगुनाई में भाव-ताव टाइट करते हैं ! ठीक नहीं यह !

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