…फाग आग आँच

.. फाग आग आँच
नरम हुई कड़ियाँ
– फिर टूटीं।

पसर गया प्रेम
शब्द शब्द आखर आखर।

… तूने क्या, कैसे, क्यों बाँध रखा था ?
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15 thoughts on “…फाग आग आँच

  1. '' .. फाग आग आँचनरम हुई कड़ियाँ- फिर टूटीं।''——- आचारज को पता था कि नरम कड़ियाँ तो टूटेंगी ही , पर इस तरह ! .'' पसर गया प्रेमशब्द शब्द आखर आखर।… तूने क्या, कैसे, क्यों बाँध रखा था ?'' ———- इतना भी लजाना शोभा नहीं देता आप से बाऊ-बौद्धिकों को ! बंधन खुला , आनंदार्द्र हुए फिर 'तर्क' क्यों ! .जयशंकर प्रसाद की तरह मैं भी कह रहा हूँ —- '' बिखरी अलकें ज्यों तर्क-जाल ''.छह ठो लाइन में कमाल किये हो बाऊ !

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