मुझसे पहली सी मुहब्ब्त . . .

मेरे प्रिय उर्दू कवि फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का आज जन्मदिन है। अभी अभी पता चला। इतने कम समय में कुछ नहीं हो सकता, इसलिए अपनी पुरानी पोस्ट दुबारा दे रहा हूँ। 
________________________________________________________
रात का समय. एक किशोर बी बी सी हिन्दी सेवा की रात्रि कालीन सभा सुन रहा है. मादक स्वर में एक नज़्म गूँजती है …मुझसे पहली सी मुहब्ब्त मेरी महबूब न माँग.
. . आठवीं (या नवीं) में पढ़ते किशोर को पहली बार यह अनुभव होता है कि प्यार क्या है ! या यूँ कहें कि क्या हो सकता है !!
… वह किशोर मैं था. फ़ैज रचित यह नज़्म नूरजहाँ गा रहीं थी. मन में फॉंस सी चुभ गई. बहुत बर्षों के बाद मुबारक बेग़म के गाए गीतकभी तनहाइयों में यूँ हमारी याद आएगी . .. को सुनते ही पुरानी फाँस हिल सी गई. मैंने फ़ैज की नज्म और नूरजहाँ के स्वर में उसका ऑडियो तलाशना प्रारम्भ किया. दोनों मिल गए . नज्म प्रस्तुत है. ऑडियो आप स्वयं तलाश लें.

मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब न माँग
मैंने समझा था के: तू है तो दरख्शाँ है हयात 1
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर2 का झगडा क्या है?
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को है सबात3
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है?
तू जो मिल जाए तो तक़दीर निग़ूँ4  हो जाए
यूँ न: था मैं न फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
और भी दु:ख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत5 के सिवा
अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म6
रेशम-ओ-अतलस-ओ-कमख़्वाब7 में बुनवाए हुए
जा-ब-जा8 बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथडे हुए, ख़ून में नहलाए हुए
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों9 से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे?
अब भी दिलकश10 है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे?
और भी दु:ख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत5 के सिवा
मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब न माँग .                                     नक़्श-ए-फ़रियादी भाग-2, 1941, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

(साभार: राजकमल पेपरबैक)

============================================
1. सुखमय जीवन, 2. सांसारिक दु:ख, 3. ठहराव, 4. बदल जाना, 5. मिलन का आनन्द्, 6. क्रूरता का अँधकारमय जाल, 7. कीमती वस्त्र 8. जगह जगह, 9. बीमारियोँ की भठ्ठी , 10. आकर्षक 
============================================
इस नज़्म की गहराई को दो बातों से मैंने समझा है:
“तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है?” और भरपूर उर्दू में भी “ग़म” के बजाय “दु:ख” शब्द का प्रयोग.
नज्म बहुत सरल सी दिखती है, प्रेमी प्रेमिका से कह रहा है कि तुम अभी भी सुन्दर हो लेकिन जमाने में इतने दु:ख दर्द हैं कि मैं अब तुम्हारी आँखों में बस डूब कर ही नहीं रह सकता, मुझे तो तमाम जुल्मों सितम भी दिखते हैं और तुमसे मिलन के बजाय जुल्मों सितम को कम करना मुझे अधिक आकर्षित करता है.
यह नज्म जब लिखी गई थी तो समाजवाद और कम्यूनिस्ट आन्दोलन का जोर था और उस ज़माने के हर सेंसिबल युवा की तरह फैज़ को भी इस विचारधारा ने बहुत प्रभावित किया.
लेकिन! लेकिन !!
फैज के अन्दर इस पुराने देश के संस्कार भी रक्त बन कर बह रहे थे और जुल्मो सितम को देखने, बूझने और भोगने से उत्पन्न दु:ख ने अलग ही रास्ता लिया. यहीं यह नज्म कइ स्तरों वाली हो जाती है. जन के दु:ख से दु:खी अभिव्यक्ति समाजवादी सोच जैसी दिखते हुए भी सूफी दर्शन, द्वैत और विशिष्टाद्वैत की सीढ़ियाँ चढ़ती बौद्ध दर्शन की करुणा में समाहित हो जाती है.
किसी ने कहा है कि श्रेष्ठ रचना रचयिता के कलम से निकलते ही उसकी न होकर सबकी हो जाती है. फिर उस पर रचयिता का कोई बस नहीं रह जाता और उसके विभिन्न अर्थ स्वयं रचयिता को भी स्तब्ध कर देते हैं…. ऐसा तो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था !
‘तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है?’
बहुत सी कविताओं और फिल्मी गीतों में बदले रूपों में आ आ कर यह अभिव्यक्ति आज कुछ पुरानी सी लगती है लेकिन कल्पना कीजिए जब यह लाइन पहली बार आई होगी. प्रेम की गहनता को व्यक्त करती इससे अच्छी लाइन हो ही नहीं सकती !
सूफी मार्ग में ईश्वर को प्रेमिका रूप में भी देखा जाता है.
सब कुछ भूल कर दीवानगी की उस हद तक पहुँच जाना कि बस मासूक की आँखों के सिवा कुछ न दिखे और दुनिया की सारी बहारें ठहर सी जाँए…जरा सोचिए फैज़ एक आम लड़के और लड़की के प्यार को भी किस तरह से ट्रीट करते हैं !! और उसके बाद का आघात जहाँ सारे जहाँ का दर्द अपना हो जाता है… जैसे कि वह मासूक जन जन में समा जाय. वह दर्द, वह यातना, वे षड़यंत्र, वे दर दर बिकते जिस्म, शोषण, वह तिल तिल गलन…फैज़ सब भोगते हैं. .और उमड़ता है दु:ख , घनघोर सर्व समाहित करता दु:ख..
दु:ख शब्द में जो सान्द्रता है वह ‘ग़म’ में नहीं.
फैज़ जुल्मो सितम और उसकी पीड़ा की सान्द्रता को दर्शाने के लिए दु:ख शब्द का प्रयोग करते हैं और कविता बुद्धत्त्व की गरिमा से उद्भासित हो जाती है.. सर्वं दुक्खम. ..
ज्ञान के बाद ही तो मुक्ति है.
अब मुझसे पहली सी मुहब्बत मत माँगो.
.

Advertisements

20 thoughts on “मुझसे पहली सी मुहब्ब्त . . .

  1. राहते और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा..वैसे एक बात कहूं…शायरी और ग़ज़ल को र्रूमानियत से बाहर निकालने के फ़ैज़ के जज़्बे के साथ…आपने अपनी टिप्पणी में रहस्यात्मकता की आभा देकर…उनके साथ थोड़ा अन्याय कर दिया है…

  2. मशहूर गजल और आपका अंदाजे बयां -बस कहर बन टूटी हैइस गजल का समग्र संघात तो जो है है ही, एक एक लाईनें अमरता पा चुकी हैं.मैं आपकी सौजन्यता उधार ले(मेरे पास अब कुछ देने को रहा कहाँ और किसी ने रीत जाने पर किनारा भी कर लिया!दुखवा कासे कहूं) किसी परम प्रिय को प्रेम पर्व की पूर्व संध्या पर अर्पित करता हूँ इस गजल को .अंत मेंउद्भाषित है या उद्भासित –बस पूंछ रहा हूँ !

  3. @ प्रेमी प्रेमिका से कह रहा है कि तुम अभी भी सुन्दर हो लेकिन जमाने में इतने दु:ख दर्द हैं कि मैं अब तुम्हारी आँखों में बस डूब कर ही नहीं रह सकता, मुझे तो तमाम जुल्मों सितम भी दिखते हैं और तुमसे मिलन के बजाय जुल्मों सितम को कम करना मुझे अधिक आकर्षित करता है गिरिजेश जी, यह लाईनें मुझे एक कहानी (शायद 'दुख') की याद दिलाती हैं। प्रेमिका अपने प्रेमी को एक पत्र लिख कहती है कि तुम क्या जानों मेरा दुख…। उसी सर्द रात को निराश हताश प्रेमी बाहर निकलता है। उसे एक बच्चा दिखाई पडता है जो ढिबरी की रोशनी में पकौडीयां बेचता है। इतनी ठंडी रात में एक बच्चे का इस तरह पकौडी बेचना उसे अजीब लगता है। वह दयार्द हो बच्चे से सभी पकौडियां खरीद लेता है लेकिन बच्चे के पास छुट्टे नहीं होते। फिर पूरे पैसे बच्चे को दे वह प्रेमी, उस बच्चे के पीछे पीछे उसके घर जाता है और वहां दिखती है उसे गरीबी, लाचारी। मां बेटे का अभाव में खिलता अनुपम प्यार। उनके दुख देख प्रेमी को अपनी प्रेमिका का पत्र याद आता है जिसमें वह कहती है कि तुम क्या जानों दुख क्या होता है। और प्रेमी वही पत्र फाडते हुए गरीबी को झांकते हुए वही शब्द दुहराता है कि तुम क्या जानों दुख क्या है। बहुत ही सुंदर नज्म पढवाई है आपने।

  4. अब शायर का नाम तो नहीं याद आ रहा.. शायद लोग मेरी मदद कर सकें.. लेकिन शे’र सुनकर अंग-अंग फड़क उठता है-भूख के अहसास को शे’रो सुखन तक ले चलोया ग़ज़ल को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलोजो ग़ज़ल माशूक के जलवों से वाक़िफ हो गईउसको अब बेवा के माथे की शिक़न तक ले चलो..एक अनुरोध- अगर इस मंच पर कोई उर्दूदाँ भी मौजूद हों, तो कृपया नुक्ता-चीनी करें.. हिन्दी के साथ साथ उर्दू और संस्कृत की व्याकरणीय अशुद्धियों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिये

  5. फैज़ के बहाने एक बेहद खूबसूरत चर्चा शुरू करने का शुक्रिया. भरपूर उर्दू में भी "ग़म" के बजाय "दु:ख" शब्द का प्रयोग.अपनी मातृभाषा के बारे में ज़्यादा क्या कहूं मगर इतना तो कहूंगा ही कि आला दर्जे की उर्दू में हिन्दी और देशज शब्दों की भरमार है. मेरा इब्ने इंशा का मुरीद होने की वजह यह भी है कि उनकी हर रचना में आपको बोलचाल की सहज उर्दू मिलती ही है – हिन्दी/संस्कृत से टकराव नहीं. चाहे "जोगी का नगर में ठिकाना क्या" हो या फिर "रात को उदास देखें, चांद को निरास देखें"

  6. राव साहब , अभी पिछले सप्ताह डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव ( अध्यक्षप्रलेस छत्तीसगढ़ ) को हमने भोपाल के लिये विदा किया और उस शाम उनसे खूब गज़ले सुनी । यह नज़्म भी वे खूब गाते हैं ।फिर हम लोगों ने इस पर चर्चा भी किया । आज इस पर चर्चा पढ़कर मज़ा आ गया ।इस नज़्म की एक एक पंक्ति मुझ पर असर डालती है .हर पंक्ति मे एक अलग अर्थ है । यह एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है । उसी तरह गुलों मे रंग भरे बादे नौबहार चले पढ़कर भी लगता है । धन्यवाद ।

  7. इस नज़्म में तो प्राण बसते हैं अपने..नूर जहां की कांपती आवाज ने फैज़ को जिला दिया है मानो…ग़म और दुःख की बात भी आपने छांट के समझी है …और समझाई है…आपके लेख से ये साफ़ साफ़ महसूस हो रहा है के इस नज़्म का असर आप पर भी उतना ही है जितना हम पर….ऐसे ही कभी ग़ालिब पर कुछ लिखें तो हमें जरूर लिंक दीजिएगा…

  8. इस नज़्म की तारीफ करने के लिए न ही मेरी कलम में ताब है न मेरी आँखों में वो शरर…'फैज़' नाम है ..एक मंजिल जहाँ तक पहुंचना तो दूर हमें रास्ते तक का इल्म नहीं…आपकी बात और है….हम जो ज़हमत करने की भी ज़हमत नहीं करेंगे..अल्लाह उन्हें जन्नत अता कर चुके होंगे…और हम भी नज़र करते हैं कुछ श्रद्धा सुमन…आमीन…

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s