युगनद्ध -3: आ रही होली

सड़क पर बिछे पत्ते
हुलस हवा खड़काय बोली
आ रही होली।


पुरा’ बसन उतार दी
फुनगियाँ उगने लगीं
शोख हो गई, न भोली
धरा गा रही होली।


रस भरे अँग अंग अंगना
हरसाय सहला पवन सजना 
भर भर उछाह उठन ओढ़ी 
सजी धानी छींट चोली। 


शहर गाँव चौरा’ तिराहे
लोग बेशरम बाग बउराए
साजते लकड़ी की डोली 
हो फाग आग युगनद्ध होली । 

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15 thoughts on “युगनद्ध -3: आ रही होली

  1. होली अच्छी नहीं लगती मुझे इसलिए कोई टिप्पणी करने से फायदा नहीं …वैसे भी मेरी टिप्पणी आपको समझ आती नहीं है ….:):) …अब ये भी एक निर्मल हास्य ही है …गंभीरता से नहीं ले ….!!

  2. एक योगी जो HAPPY NEW YEAR कहने पर करीब-करीब भड़क उठता हो..देखो उल्लास और शृंगार के भारतीय-पर्व पर इसका उत्साह देखते ही बनाता है..!राव साहब..! आपकी सतत साधना/प्रयोगशीलता से अभिभूत होकर 'योगी' शब्द प्रयोग किया है..!(कोई निर्मल हास्य नहीं किया है.) होली की जो रंगीन दुन्दभी आपने बजाई है..रंग छा गया है अपने ऊपर भी..!

  3. होरी खेलूं मैं गोरी..कान्हा करत बरजोरीहमरी भीजी अनारी सारीकाहे मारत पिचकारी..अरे भाई हम ता एकदम उलटबाँसी है..होली हमरा सबसे प्रिय त्यौहार..ई हम करते हैं स्वीकारगिरिजेश बाबू मचाये हैंहोली की हुडदंगकाव्य रंग की छटादेख हुए हम दंग..होलिका दहन..ब्लाग पर ..!!!अनुपम …!!

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