आचारज जी

फाग पर्व शुरुआत यहाँ से है। 
फिर इहाँ 
फिर इहाँ। 
और अब नीचे ताकिए।
आप भी योगदान कर सकते हैं इस संक्रामक रोग को फैलाने में ।
इंटरनेट पर भी बसंत में आम बौराना चाहिए। रंग है, हुड़दंग है। 

__________________

फागुन आइल आचारज जी
लागे पहेली सोझ बतियाँ आचारज जी
अरे, आचारज जी।
 
नेहिया ले फन्दा मदन बौराया
मदन बौराया मदन बौराया
तेल पोतलें देहियाँ आचारज जी
न खाएँ गुलगुल्ला आचारज जी
आइल फागुन लखेरा आचारज जी।

बिछली दुअरवा लगन लग घूमे
लगन लग घूमे लगन लग घूमे
ताकें हमरी रसोइया आचारज जी
न खाएँ गुलगुल्ला आचारज जी।

मकुनी औ मेवा रोटी पकवलीं
चटनी पोत बिजना परोसलीं
बरजोरी से आए आचारज जी
अरे, आचारज जी।
चटकारा ले खाएँ आचारज जी
जो देखे कोई थूकें आचारज जी

न खाएँ गुलगुल्ला आचारज जी।

अरे आचारज जी। 
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15 thoughts on “आचारज जी

  1. पिया संग खेलों होरी फागुन आयो रे…अब कहू ..महराज ई आचारज जी के गुड़ नीमन लागेला और गुलगुला से परहेज….??काहे ??और ई फगुवा के भाँग चढल बा, रसोई में ताका झांकी न चली…देहिया में मोबिलवा पोतल है का महा करिया देखाता…ई फाग के भाग कहा कहों, गिरिजेश सजाय गयो शब्द के मोती..

  2. आप जानते ही नहीं आचरज जी गुल खाएं गुलगुले से परहेज करने वाले हैं(प्रत्यक्षतः ).और कविताई तो बस जुलुम है -निर्दयी निष्ठुर अनंग मदन आपके जरिये समूचे ब्लागजगत पर धावा कर बैठा है .दिग दिगंत चेत जायं ….एकनिष्ठाएं आगाह हो लें …कुछ दिन काफी भारी पड़ने वाले हैं यहाँ !

  3. .मेले से आ गया हूँ .. बहुत थका हूँ पर यह क्या ! .. यहाँ आते ही इस कविता की प्यारी लय ने तरो(तरुण)-ताजगी दी .. आप आवेग में ऐसे सुन्दर प्रयोग करते हैं ( आवेग को कृपया नकारात्मक न लीजियेगा ) , अगर यह बात पता होती तो विधाता से कहता कि इस 'बाऊ' के दिमाग में आवेग को वैसे ही डाल दीजिये जैसे हमरे मौर्या जी हमैं आलू – टमाटर के साथे सब्जी मा थोर के मिर्चा भी डारि दियत हैं .. बहरहाल असहमत होने के बाद भी कविता की तारीफ कर रहा हूँ .. आभार ! …पहले तो एक बात बता दें कि हम 'आचारज' नहीं हैं ( जैसा कि मेरी प्रयोगों को न समझ पाने वाली दो टके की बुद्धि समझ पा रही है ) .. न हम पुरोहितयी करते हैं , न हममें आचार्यत्व है अतः संभव हो तो यह अलंकरण (?) हमें वैसे ही न दें जैसे भारत सरकार अयोग्यों को 'पद्म' बाँट रही है .. बाऊ ! तत्काल प्रभाव से इसे ख़ारिज करें .. यह विनती है आपसे , आशा है आप मान लेंगे .. .राव साहब !मेरे पास भी ह्रदय है , हँसता हूँ , महसूसता हूँ , गाता हूँ ,,,, फगुवाता हूँ पर फगुनांध नहीं होता , जो खटकता है कहता हूँ , अच्छा लगे चाहे बुरा ,.. जिन्दगी वाद- विवाद – संवाद नहीं तो और क्या है ! .. इसी जिन्दगी से प्यार है और करता भी रहूँगा बगैर फगुनांध हुए …@ '' …. महराज ई आचारज ……. देहिया में मोबिलवा पोतल है का महा करिया देखाता… '' सही कहा आपने !/?.. जो इंसानों से हट कर 'कौवा – बगुला संवाद ' सुनता – कहता हो उसमें कौव्वे का कालापन तो होगा ही ! .. अच्छा लगा कि आप बोलीं तो ''…. देहिया में मोबिलवा पोतल है का महा करिया देखाता… '' ………… आभार !!!

  4. @ अमरेन्द्र जीप्रस्तुत हैं दो बन्दिशें – फाग(अर्ज नहीं)किया है:(1) लागल करेजा फागुन के बतियाँअरे भइलें अकारन चारज हमरे अचारज जी ।नजर बौराया नजर बौरायाअरे कहें अखियाँ अकारजचारज भइलें अचारज जी। (2) सुधि लै ल हो श्याम कहें ब्रज नारी sssऊधो बुझिहें न बात के बात कहें ब्रज नारी sss_________________________अरे भाई, हमारे आचार्य आप ही हैं। आप के आचार्य हम हैं। हम दोनों के आचार्य 'ह म श टुन टुन' हैं। क्यों इतना दिल पर ले रहे हैं? यहाँ सब ठठ्ठा चल रहा है। आनन्द लीजिए। कल की कविता की प्रतीक्षा कीजिए। हाँ, अदा जी ने आप को 'मोबिलवा पोतल' नहीं कहा है।जिन्हें कहा है वे सज्जन यहीं टिप्पणी किए हैं। जरा ध्यान से पढ़िए। समझ जाएँगे। जब उन्हें नहीं तकलीफ तो आप क्यों हलकान हुए जा रहे हैं। क न ड भाई क न ड। न समझ में आया हो तो फोन कीजिए, बताता हूँ। हा हा हा 🙂

  5. मेरे गाँव में एक लालसाहब हैं। वे कोई साहब नहीं हैं बल्कि यह उनका नाम है। होली में गाँव के सभी लड़के और जवान उनको सुबह गोबर से नहलाने, दोपहर में काला मोबिल पोतने और गाढ़े रंग से तर करने की फिराक में रहते हैं। शाम होते होते उनको पहचानना मुश्किल हो जाता है। बस उनके द्वारा दी गयीं सौ-सौ गालियाँ सबको आकर्षित करती हैं।सभी उनका मजाक उड़ाते हैं लेकिन किसी की होली उनके बगैर चलती भी नहीं है। उन्हें भीतर से कष्ट तो होता होगा लेकिन गाँव में किसी को उनसे सहानुभूति नहीं होती। कारण है उनका लगातार बोलना और गाली देना बेचारे…। गाँव के लंठ लड़के हर साल उनके साथ कोई नया कांड करने की तैयारी करते हैं। क्या ब्लॉगजगत में भी ऐसी फ़गुनहट बहने के संकेत नहीं दिख रहे हैं? मुझे तो यहाँ गिरिजेश भ‍इया भी उस लंठमण्डली के सदस्य लग रहे हैं। 🙂

  6. लड़कपन में.. दो मित्र.. जब हम होली के रंग में सराबोर हो जाते थे तो एक दूसरे पर इतना ज्यादा चीखते-चिल्लाते, मारपीट करने का ढोंग करते कि कोई तीसरा सहानुभूति दिखाता, बचाने चला आता! आता तो हमारे जाल में फंस कर खुद भी रंगा जाता!!बसंत के रंग में रंगे 'हिंदी' ब्लॉग के साथियों का यह कवित्त-फाग भी कहीं ऐसा ही तो नहीं !! …जरा संभल के भैया.. खतरा लगता है!!!

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