बसन तन पियर सजल हर छन

यह कविता देवेन्द्र जी के इस गीत को पढ़ने से उपजी है।
हमरा कउनो कुसूर नाहीं है।
इसमें किसी के लिए छिपा सन्देश भी है। आशा है समझ जाएँगें।

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बसन तन पियर
सजल हर छन।

हरख हरखन
टुटल बरत
नवरतन बरजन ।

मदन अगन मगन मन
हर मन सगुन धुन
गुन गुन ….

ह म श टुन टुन
खदकत अदहन धुन!
..अवगहन


बसन तन पियर
सजल हर छन
छन छ्न …

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सरलार्थ:

बसन – वस्त्र, पति
पियर – पीला, प्रिय
सजल – नवरस से भरा, सजा हुआ
छ्न – क्षण, छन छन की ध्वनि
हरख – हर्ष
हरखन – प्रसन्नता
टुटल – टूट गया
बरत – व्रत
नवरतन – नवरात्र, नव-रति
बरजन – वर्जना
अगन – अग्नि
सगुन – शुभ आगम का संकेत
खदकत – खौलता हुआ
अदहन – चावल पकाने के लिए चूल्हे पर चढ़ाया हुआ खौलता पानी
अवगहन – अवगाहन, कोई बात जानने या समझने के लिए उसके संबंध में की जानेवाली खोज, छान-बीन या मनन
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20 thoughts on “बसन तन पियर सजल हर छन

  1. वाह! क्या बात है!!हमसे दो कदम आगे …अभी अपूर्व जी के प्रश्न का उत्तर शेष है?आयो रे बसंत चहुँ ओर….हरख हरखनटुटल बरतनवरतन बरजनखदकत अदहन!..अवगहनआयो रे बसंत चहुँ ओर…….ह म श

  2. पूरा बसंतियाये हुए हैं आप भी…बात का है ??और ई माँ जो संदेसवा है …उहो हम समझ गए हैं….काहे को टुन्ना को टुनटुना रहे हैं महराज…छेड़ने से बाज नहीं आवेंगे का :):)कहीं ह म श भड़क गए तो लेवे के देवे पड़ी…. हाँ नहीं तो….

  3. आपकी यह कविताई इसलिये पचा जाता हूँ कि देखता हूँ हाव के पीछे भाव दौड़ा चला आ रहा है, नहीं तो हाव-भाव डराता ही है ऐसी कविताओं का ! संकेत तो हमहूँ समझ गये 🙂 चुप्पै रहैं न ?

  4. @ हिमांशु जी आह्लाद में कभी कभी नाचने को मन करता है। अब नाचना तो आता नहीं लेकिन शब्दों और ध्वनियों के साथ हाव हाव करते ठुमका लगाना आता है। अभी तक मस्त हूँ, बार बार पढ़ कर प्रसन्न हो रहा हूँ। फागुन आ रहा है और नृत्य में जोड़ीदार तो चाहिए न ! "इमली का बूटा बेरी का पेंड़ इमली खट्टी मीठे बेर इस जंगल में हम दो शेर चल घर जल्दी हो गइ देर.. धिनक धिनक धिन तारा धिनक धिन रे !" ..जरा ध्यान से देखें पढ़ें आर्य ! सिर्फ शब्दों का खेल या बाल पोथी(कर्टसी – बड़के भैया) की लाइनें नहीं हैं ये ! भाव के साथ भी बहुत कुछ इसमें है… धिनक धिनक धिन तारा धिनक धिन रे..

  5. अदहन खदकत भदर-भदरढक्कन खड़कत खड़र-खड़रकरछुल टनकत टनर-टनरलौना लहकत लपर-लपरबटुली महकत महर-महरपहँसुल कतरत खटर-खटरसिलबट रगड़त चटर-पटरलहसुन गमकत उदर-अधरराम रसोई हुई मुखरकविता बोली देख इधर 🙂

  6. आचारज जी!न तो देवेन्द्र जी का गीत जड़-रवायत है और न मेरी बन्दिश। और सिद्धार्थ की कविता रसोई का गीत है।जरा उस उल्लास को समझें ।प्रयोग 5 मिनट में नहीं किए जाते, बस मन नृत्य करता है, अक्षर सजते हैं और बन्दिशें की बोर्ड पर उतर आती हैं।पहले भी होता रहा है – कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि हो या ताक कमसिन वारि या ससुराल गेंदा फूल हो…. इमली के बूटे, बेरी के फूल और घर जल्दी जाने में कोई संगति नहीं बस उल्लास है …..जाय दो ! फागुन का जानें कठ करेजी !!हम त होली तक अइसहि करबे, कोई कोहनाय तो उसकी बला से …बड़े आए आचारज ! हुँ ।______________________हँ, इहो बताय दो कि उहाँ का कौन सा 50% वहीं छोड़ आए हो और कौन सा 50% इहाँ लाए हो? दिल्ली में नाहीं पता लेकिन नखलौ माँ फगुनहट बहने लगी है और इस मौसम में 100 गुनाह मुआफ और 1000 गुनाह बेशरम हो किए जात हैं… क्षमा जी से मेरी क्षमा बोल दीजिएगा।

  7. भईया ! समझे नहीं आप भी ! फगुनाई में सब उलट-पुलट के ही सोच रहे हैं । जरा खयाल कर फिर से पढ़े,मैं खुलने लगूँगा । झूठ-ही रिसिया गये ! मतलब तो समझें ! रचना का वसन बनने दें ! मैं उसी की बात तो कर रहा हूँ । जहाँ हाव के पीछे भाव नहीं, वहाँ ठहरा रहे हैं । निराश हुआ कि हाव-हाव में ही उलझा रहे हैं ! अब यह बताइये मैं यहाँ क्या सोच कर आऊँ – यह सोचकर कि भोजन करने जा रहा हूँ, पथ पर हाव-हाव नाचने जा रहा हूँ या यह सोचकर कि दुर्योधन का मेवा छोड़ विदुर का शाक खाने जा रहा हूँ, चित्रकूट की राह जा रहा हूँ, जिसमें राम के चरण-चिह्न मिलेंगे !बाकी मेरा सर, आपकी ओखली !

  8. पुनश्च: साधारण पाठक के लिए असाधारण रचना और प्रकारांतर से मेरे जैसे कथित आसाधारण पाठक के लिए साधारण !तभी बालपोथी याद आयी ..कुछ और लोग भी रचना समझ नहीं पाए हैं और उनकी पीड़ा पढ़ दुबारा यहाँ लौटा हूँ .मदन चंचल मदमस्त पहल करतपवन सनसन जी धनधन कहतमन धकधक जनजन हलचलपलपल धड़कन बढ़तपरत दर परत खुलतचल हट भल अगर चहत

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